मसौदा राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2019

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राष्ट्रीय शिक्षा नीति का मसौदा तैयार करने के लिए मानव संसाधन मंत्रालय ने जून 2017 में एक कमिटी (डॉ. के. कस्तूरीरंगन) का गठन किया गया था। इस कमिटी ने 31 मई, 2019 को अपनी रिपोर्ट सौंपी। रिपोर्ट शिक्षा नीति को प्रस्तावित करती है। यह नीति मौजूदा शिक्षा प्रणाली की निम्नलिखित चुनौतियों को लक्षित करती है: (i) पहुंच, (ii) समानता, (iii) क्वालिटी, (iv) वहन करने योग्य, और (v) जवाबदेही।
 

मसौदा नीति स्कूल से लेकर उच्च शिक्षा के सभी स्तरों में सुधार का प्रावधान करती है। यह बचपन में प्रारंभिक देखभाल पर अधिक ध्यान देने, मौजूदा परीक्षा प्रणाली में सुधार करने, शिक्षकों के प्रशिक्षण को मजबूत करने तथा शिक्षा के रेगुलेटरी फ्रेमवर्क को दोबारा बनाने का प्रयास करती है। मसौदा नीति इस बात का भी प्रयास करती है कि राष्ट्रीय शिक्षा आयोग का गठन किया जाए, शिक्षा में सरकारी निवेश बढ़ाया जाए, तकनीक के प्रयोग को मजबूत किया जाए और व्यावसायिक एवं प्रौढ़ शिक्षा पर अधिक ध्यान दिया जाए, इत्यादि। मसौदा नीति के मुख्य निष्कर्षों और सुझावों में निम्न शामिल हैं:

स्कूली शिक्षा

बचपन में प्रारंभिक देखभाल और शिक्षा: शिक्षा तक पहुंच न होने के अतिरिक्त कमिटी ने यह गौर किया कि मौजूदा शिक्षण कार्यक्रमों में भी क्वालिटी संबंधी अनेक कमियां हैं। इनमें निम्नलिखित शामिल हैं: (i) ऐसे करिकुलम जो बच्चे की विकास संबंधी जरूरतों को पूरा नहीं करते, (ii) क्वालिफाइड और प्रशिक्षित शिक्षकों का अभाव, और (iii) शिक्षण का निम्न स्तर। वर्तमान में आंगनवाड़ियों और निजी प्री-स्कूलों के जरिए अधिकतर बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा प्रदान की जाती है। हालांकि प्रारंभिक देखभाल में शैक्षणिक पहलु पर कम ध्यान दिया जाता है। इसीलिए मसौदा नीति में प्रारंभिक देखभाल और शिक्षा के लिए दो स्तरीय करिकुलम विकसित करने का सुझाव दिया गया है। इसमें निम्नलिखित शामिल हैं: (i) तीन वर्ष तक के बच्चों के लिए दिशानिर्देश (ये दिशानिर्देश माता-पिता और शिक्षकों के लिए हैं), और (ii) तीन से आठ वर्ष के बच्चों के लिए शिक्षा संबंधी फ्रेमवर्क। इन्हें लागू करने के लिए आंगनवाड़ी प्रणाली में सुधार किया जाए और उन्हें व्यापक बनाया जाए, तथा आंगनवाड़ियों को प्राथमिक स्कूलों के परिसर में शिफ्ट किया जाए।
 

शिक्षा का अधिकार एक्ट, 2009 (आरटीई एक्ट) : वर्तमान में आरटीई एक्ट छह से 14 वर्ष तक के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान करता है। मसौदा नीति इस बात का सुझाव देती है कि आरटीई के दायरे को बढ़ाया जाए ताकि बचपन की प्रारंभिक शिक्षा और माध्यमिक स्कूली शिक्षा को इसमें शामिल किया जा सके। इससे एक्ट के दायरे में तीन से 18 वर्ष तक के बच्चे शामिल हो जाएंगे।
 

इसके अतिरिक्त कमिटी ने सुझाव दिया है कि आरटीई एक्ट में निरंतर और व्यापक मूल्यांकन तथा नो डिटेंशन पॉलिसी से संबंधित संशोधनों की समीक्षा की जाए। कमिटी ने कहा कि कक्षा आठ तक के बच्चों को फेल नहीं किया जाना चाहिए। इसके बजाय स्कूलों को सुनिश्चित करना चाहिए कि बच्चों को उनकी आयु के अनुकूल उचित स्तर की शिक्षा प्राप्त हो रही है।
 

करिकुलम का फ्रेमवर्क: बच्चों की विकास संबंधी जरूरतों को देखते हुए स्कूली शिक्षा की मौजूदा संरचना को एक बार फिर से बनाया जाना चाहिए। इसका डिजाइन 5-3-3-4 के आधार पर तैयार किया जाना चाहिए जिनमें निम्नलिखित शामिल हों: (i) पांच वर्ष का आधारभूत चरण (तीन वर्ष की प्री-प्राइमरी और कक्षा एक और दो), (ii) तैयारी के तीन वर्ष- कक्षा तीन से पांच), (iii) माध्यमिक चरण के तीन वर्ष (कक्षा छह से आठ), और (iv) माध्यमिक चरण के चार वर्ष (कक्षा नौ से 12)।
 

कमिटी ने कहा कि मौजूदा शिक्षा प्रणाली का पूरा ध्यान सिर्फ तथ्यों और प्रक्रियाओं के रटने पर केंद्रित है। इसलिए उसने सुझाव दिया कि प्रत्येक विषय में करिकुलम का भार कम किया जाए और जरूरी मुख्य कंटेंट पर ही ध्यान दिया जाए। इससे समग्र, चर्चा और चर्चा आधारित शिक्षा के लिए गुंजाइश बनेगी।
 

स्कूलों की परीक्षाओं में सुधार: कमिटी ने कहा कि मौजूदा बोर्ड परीक्षाओं के कारण: (i) बच्चे कुछ ही विषयों पर ध्यान केंद्रित करते हैं, (ii) शिक्षण की रचनात्मक तरीके से परीक्षा नहीं हो पाती, और (iii) विद्यार्थियों को तनाव होता है। स्कूल में बच्चे की प्रगति की निगरानी करने के लिए मसौदा नीति में कक्षा तीन, पांच और आठ में राज्य सेंसस परीक्षाओं का प्रस्ताव है। इसके अतिरिक्त कमिटी ने केवल मुख्य कॉन्सेप्ट्स, कौशल और उच्च श्रेणी की दक्षता की जांच के लिए बोर्ड परीक्षाओं के पुनर्गठन का सुझाव दिया है। इससे विद्यार्थी अनेक प्रकार के विषयों की परीक्षाएं दे पाएंगे। वे अपने विषय और सेमिस्टर चुनेंगे, ताकि वे तब परीक्षा दें, जब देना चाहें। ये परीक्षाएं स्कूलों की अपनी फाइनल परीक्षाओं का स्थान लेंगी।
 

स्कूल का इंफ्रास्ट्रक्चर: कमिटी ने कहा कि देश के हर इलाके में प्राथमिक स्कूल बनाने से शिक्षा तक लोगों की पहुंच बढ़ी है। हालांकि इससे बहुत छोटे स्कूल भी स्थापित किए गए हैं (जहां विद्यार्थियों की संख्या बहुत कम है)। स्कूल छोटे होने से उसे संचालित करना मुश्किल होता है। इसका असर शिक्षकों की तैनाती और भौतिक संसाधनों की उपलब्धता पर पड़ता है। इसलिए मसौदा नीति यह सुझाव देती है कि कई सरकारी स्कूलों को मिलाकर एक स्कूल परिसर बनाया जाए। एक परिसर में एक माध्यमिक स्कूल (कक्षा नौ से बारह) और आस-पड़ोस के ऐसे सभी सरकारी स्कूल आने चाहिए जोकि प्री-प्राइमरी से लेकर कक्षा आठ तक की शिक्षा प्रदान करते हैं।
 

स्कूल परिसरों में आंगनवाड़ियां, व्यावसायिक शिक्षा केंद्र और प्रौढ़ शिक्षा केंद्र भी शामिल होंगे। प्रत्येक स्कूल परिसर एक अर्ध स्वायत्त इकाई होगी, जिसमें बाल्यावस्था से लेकर माध्यमिक शिक्षा- यानी शिक्षा के सभी चरणों में एकीकृत शिक्षा प्रदान करेंगी। इससे यह सुनिश्चित होगा कि संसाधनों, जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर और प्रशिक्षित शिक्षकों को स्कूल परिसर में प्रभावी रूप से साझा किया जा सके।
 

शिक्षकों का प्रबंधन: कमिटी ने कहा कि शिक्षकों की संख्या कम है और पेशेवर तौर पर प्रशिक्षित शिक्षकों का भी अभाव है। साथ ही गैर शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए शिक्षकों की तैनाती की जाती है। मसौदा नीति में सुझाव दिया गया है कि एक शिक्षक को एक स्कूल परिसर में कम से कम पांच से सात वर्ष तक तैनात किया जाए। इसके अतिरिक्त शिक्षकों को स्कूली घंटों के दौरान गैर शैक्षणिक गतिविधियों में भाग लेने (जैसे मिड डे मील पकाने या टीकाकरण अभियानों में हिस्सा लेने) की अनुमति नहीं होगी जोकि उनकी शिक्षण क्षमताओं को प्रभावित कर सकती है।
 

शिक्षकों के शिक्षण के लिए मौजूदा बी.एड. प्रोग्राम को चार वर्ष के एकीकृत बी.एड. प्रोग्राम से रिप्लेस किया जाएगा जिसमें उच्च क्वालिटी का कंटेंट, शिक्षण का स्तर, और व्यावहरिक प्रशिक्षण शामिल होगा। सभी विषयों के लिए निरंतर एकीकृत पेशेवर विकास को भी विकसित किया जाएगा। शिक्षकों से हर वर्ष न्यूनतम 50 घंटे के निरंतर पेशेवर विकास प्रशिक्षण को पूरा करने की अपेक्षा की जाएगी।  
 

स्कूलों का रेगुलेशन: मसौदा नीति स्कूलों के रेगुलेशन को नीति निर्धारण, स्कूल के संचालन और शैक्षणिक विकास जैसे पहलुओं से अलग करने का सुझाव देती है। इसमें सुझाव दिया गया है कि प्रत्येक राज्य के लिए एक स्वतंत्र राज्य स्कूल रेगुलेटरी अथॉरिटी की स्थापना की जाए जो सरकारी और निजी स्कूलों के लिए बुनियादी यूनिफॉर्म स्टैंडर्ड्स को निर्धारित करेगी। राज्य के शिक्षा विभाग नीतियां बनाएंगे और निरीक्षण करेंगे।

उच्च शिक्षा

अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में उच्च शिक्षा में सकल दाखिला अनुपात (जीईआर) 2011-12 में 20.8% से बढ़कर 2017-18 में 25.8% हो गया।

तालिका 1: विभिन्न देशों में जीईआर के बीच तुलना (2014)
प्राथमिक
 (कक्षा 1-5)

उच्च प्राथमिक (कक्षा 6-8)

उच्च माध्यमिक (कक्षा 9-12)

उच्च शिक्षा

भारत

101.4

89.3

62.5

23

चीन

103.9

100.4

88.8

39.4

यूएसए

99.5

101.9

93.2

86.7

जर्मनी

103.3

101.6

104.6

65.5

Source: Educational Statistics at Glance (2016), MHRD; PRS.

कमिटी ने कहा कि देश में उच्च शिक्षा में निम्न दाखिले का मुख्य कारण यह है कि उस तक लोगों की पहुंच नहीं है। उसने जीईआर के 25.8% के मौजूदा स्तर को 2035 तक 50% करने का लक्ष्य निर्धारित किया। इस संबंध में मुख्य सुझावों में निम्नलिखित शामिल हैं:
 

रेगुलेटरी संरचना और एक्रेडेशन: कमिटी ने कहा कि मौजूदा उच्च शिक्षा प्रणाली में बहुत से रेगुलेटर हैं और उनके मैन्डेट्स ओवरलैप होते हैं। इससे उच्च शिक्षण संस्थानों की स्वायत्तता पर असर होता है और निर्भरता तथा केंद्रीकृत नीति निर्धारण का वातावरण तैयार होता है। इसलिए कमिटी ने राष्ट्रीय उच्च शिक्षा रेगुलेटरी अथॉरिटी (एनएचईआरए) की स्थापना का प्रस्ताव रखा। यह स्वतंत्र अथॉरिटी उच्च शिक्षा के रेगुलेटरों का स्थान लेगी जिसमें पेशेवर और व्यावासियक शिक्षा के रेगुलेटर भी शामिल हैं। इसका अर्थ यह है कि सभी पेशेवर परिषदों, जैसे एआईसीटीई और भारतीय बार काउंसिल की भूमिका केवल पेशेवर प्रैक्टिस के लिए मानदंड बनाने तक सीमित हो जाएगी। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) का काम भी केवल उच्च शिक्षण संस्थानों को अनुदान देने तक सीमित होगा।
 

वर्तमान में नेशनल एसेसमेंट एंड एक्रेडेशन काउंसिल (एनएएसी) एक एक्रेडेटड निकाय है जो यूजीसी के अंतर्गत आती है। मसौदा नीति ने एनएएसी को यूजीसी से अलग करके एक स्वतंत्र और स्वायत्त निकाय बनाने का सुझाव दिया है। इस भूमिका में एनएएसी टॉप लेवल की एक्रेडेटर के तौर पर काम करेगी और विभिन्न एक्रेडिटेशन संस्थानों को लाइसेंस जारी करेगी जोकि उच्च शिक्षण संस्थानों का हर पांच से सात वर्षों में एक बार मूल्यांकन करेगी। सभी मौजूदा शिक्षण संस्थानों का एक्रेडेशन 2030 तक हो जाना चाहिए।
 

नए उच्च शिक्षण संस्थानों की स्थापना: वर्तमान में उच्च शिक्षण संस्थान केवल संसद या राज्य कानूनों के जरिए स्थापित किए जा सकते हैं। मसौदा नीति प्रस्तावित करती है कि इन संस्थानों को एनएचईआरए से हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन चार्टर के जरिए स्थापित करने की अनुमति दी जा सकती है। इस चार्टर को कुछ विशिष्ट मानदंडों के पारदर्शी मूल्यांकन के आधार पर प्रदान किया जाएगा। सभी नए उच्च शिक्षण संस्थानों को स्थापना के पांच वर्षों के भीतर एनएचईआरए से एक्रेडेशन हासिल हो जाना चाहिए।
 

उच्च शिक्षण संस्थानों का पुनर्गठन: उच्च शिक्षण संस्थानों को तीन श्रेणियों में पुनर्गठित किया जाएगा: (i) शोध विश्वविद्यालय जोकि शोध और शिक्षण दोनों पर ध्यान केंद्रित करेंगे, (ii) शिक्षण विश्वविद्यालय जोकि शिक्षण पर मुख्य रूप से ध्यान केंद्रित करेंगे लेकिन महत्वपूर्ण शोध भी करेंगे, और (iii) कॉलेज, जोकि केवल अंडरग्रैजुएट शिक्षा देंगे। धीरे-धीरे इन सभी को पूर्ण शैक्षणिक, प्रशासनिक और वित्तीय स्वायत्तता दी जाएगी।
 

राष्ट्रीय शोध प्रतिष्ठान की स्थापना: कमिटी ने गौर किया कि भारत में शोध और नवाचार में कुल निवेश 2008 में 0.84% के मुकाबले गिरकर 2014 में 0.69% रह गया। भारत दूसरे देशों की तुलना में शोधार्थियों (प्रति लाख आबादी में), पेटेंट्स और पब्लिकेशंस के लिहाज से भी पिछड़ा हुआ है।

तालिका 2: शोध और नवाचार में निवेश

 

शोध और नवाचार में निवेश (जीडीपी का %)

शोधकर्ता (प्रति लाख जनसंख्या)

पेटेंट्स के कुल आवेदन

भारत

0.7

15

45,057

चीन

2.1

111

13,38,503

यूएसए

2.8

423

605,571

इज़राइल

4.3

825

6,419

Source: Economic Survey of India 2017-18; PRS

मसौदा नीति राष्ट्रीय शोध प्रतिष्ठान की स्थापना का सुझाव देती है जोकि एक स्वायत्त निकाय होगा ताकि भारत में उच्च स्तरीय शोध के लिए फंडिंग, मेंटरिंग और क्षमता निर्माण किया जा सके। प्रतिष्ठान के चार प्रमुख प्रभाग होंगे: विज्ञान, तकनीक, सामाजिक विज्ञान और आर्ट्स एवं ह्यूमैनिटीज़। इसमें और प्रभाग जोड़े जा सकते हैं। प्रतिष्ठान को 20,000 करोड़ रुपए (जीडीपी का 0.1%) का वार्षिक अनुदान प्रदान किया जाएगा।
 

उदार दृष्टिकोण की ओर बढ़ना: मसौदा नीति सुझाव देती है कि अंडरग्रैजुएट प्रोग्राम्स को बहुअनुशासनिक (इंटरडिसिपलिनरी) बनाया जाए। इसके लिए इनके करिकुलम को दोबारा बनाना होगा ताकि निम्नलिखित को शामिल किया जा सके: (क) एक समान मुख्य करिकुलम और (ख) स्पेशलाइजेशन के एक/दो क्षेत्र। विद्यार्थियों को स्पेशलाइजेशन के लिए एक क्षेत्र को ‘मेजर’ और वैकल्पिक क्षेत्र को ‘माइनर’ के तौर पर चुनना होगा। लिबरल आर्ट्स में चार साल के अंडरग्रैजुएट प्रोग्रम्स शुरू किए जाएंगे और विद्यार्थियों को उचित सर्टिफिकेशन के साथ एक से अधिक निकास विकल्प (एक्जिट ऑप्शन्स) मुहैय्या कराए जाएंगे। इसके अतिरिक्त अगले पांच वर्षों में लिबरल आर्ट्स के पांच भारतीय संस्थानों को बहुअनुशासनिक लिबरल आर्ट्स के मॉडल संस्थानों के रूप में स्थापित किया जाना चाहिए।
 

फैकेल्टी का प्रोफेशनल विकास: कमिटी ने गौर किया कि उच्च शिक्षण संस्थानों में काम करने की खराब स्थितियां और शिक्षण के अत्यधिक दबाव से शिक्षकों का मनोबल गिरा है। इसके अतिरिक्त स्वायत्तता की कमी और करियर में प्रगति की व्यवस्थित प्रणाली न होने का भी असर हुआ है। मसौदा नीति सुझाव देती है कि सभी उच्च शिक्षण संस्थानों में 2030 तक फैकेल्टी के लिए निरंतर पेशेवर विकास कार्यक्रम विकसित किया जाए और स्थायी रोजगार (टैन्योर) ट्रैक प्रणाली की शुरुआत की जाए। इसके अतिरिक्त अधिकतम 30:1 के विद्यार्थी-शिक्षक अनुपात को सुनिश्चित किया जाए।
 

सीखने का श्रेष्ठ माहौल: कमिटी ने कहा कि करिकुलम गैर लचीला, संकुचित और पुराना है। हालांकि फैकेल्टी के पास अक्सर करिकुलम डिजाइन करने की स्वायत्तता नहीं होती जिसका शिक्षण के स्तर पर नकारात्मक असर होता है। कमिटी ने सुझाव दिया था कि सभी उच्च शिक्षण संस्थानों को करिकुलम, शिक्षण और संसाधन से संबंधित मामलों में पूरी स्वायत्तता मिलनी चाहिए।

शिक्षा में गवर्नेंस

कमिटी ने कहा कि शिक्षा में गवर्नेस की मौजूदा प्रणाली पर पुनर्विचार तथा विभिन्न मंत्रालयों, विभागों और संस्थाओं के बीच सिनर्जी एवं समन्वय कायम करने की जरूरत है। इस संबंध में कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए हैं:
 

प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में राष्ट्रीय शिक्षा आयोग की स्थापना जोकि शिक्षा का एपेक्स निकाय होगा। यह निकाय निरंतर और सतत आधार पर देश में शिक्षा के दृष्टिकोण को विकसित करने, उसे लागू करने, उसका मूल्यांकन करने और उस पर पुनर्विचार करने के लिए जिम्मेदार होगा। वह राष्ट्रीय शिक्षा अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी), प्रस्तावित राष्ट्रीय उच्च शिक्षा रेगुलेटरी अथॉरिटी तथा राष्ट्रीय शोध प्रतिष्ठान सहित अनेक निकायों के कामकाज और उनके कार्यान्वयन की निगरानी करेगा।
 

मानव संसाधन और विकास मंत्रालय को दोबारा शिक्षा मंत्रालय नाम दिया जाना चाहिए ताकि शिक्षा पर फिर से ध्यान केंद्रित किया जा सके।

शिक्षा का वित्त पोषण

मसौदा नीति ने शिक्षा में 6% सरकारी व्यय की प्रतिबद्धता को दोहराया। उल्लेखनीय है कि पहली राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 1968 ने शिक्षा में जीडीपी के 6% व्यय का सुझाव दिया था जिसे 1986 में दूसरे एनईपी ने दोहराया था। 2017-18 में भारत में शिक्षा पर सरकारी व्यय जीडीपी का 2.7% था।

तालिका 3: शिक्षा में कुल सार्वजनिक निवेश

देश

2017 में निवेश (जीडीपी के % के रूप में)

भारत

2.7

यूएसए

5

यूके

5.5

ब्राजील

6

शिक्षा पर कुल सार्वजनिक व्यय 10% है। मसौदा नीति इस दर को अगले 10 वर्षों में दोगुना करके 20% करने का प्रयास करती है। अतिरिक्त 10% में से 5% विश्वविद्यालयों और कॉलेजों (उच्च शिक्षा) पर खर्च किया जाएगा, 2% अतिरिक्त स्कूली शिक्षा में शिक्षकों की लागत या संसाधनों पर और 1.4% बच्चों की शुरुआती देखभाल और शिक्षा पर खर्च किया जाएगा।
 

कमिटी ने परिचालनगत समस्याओं और धनराशि के वितरण में लीकेज पर गौर किया। उदाहरण के लिए यह गौर किया गया कि जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थानों में लगभग 45% रिक्तियां हैं जिनके कारण उनके आबंटनों का इस्तेमाल नहीं किया गया या प्रभावी तरीके से इस्तेमाल नहीं हुआ। कमिटी ने संस्थागत विकास योजनाओं के जरिए धनराशि के अधिकतम और यथासमय उपयोग का सुझाव दिया।

शिक्षा में तकनीक

कमिटी ने गौर किया कि तकनीक निम्नलिखित में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है: (क) कक्षाओं में सीखने, सिखाने और मूल्यांकन की प्रक्रिया में सुधार करना, (ख) शिक्षकों को तैयार करने और उनके निरंतर पेशेवर विकास में सहायता देना, (ग) सुदूर क्षेत्रों तथा वंचित समूहों में शिक्षा तक पहुंच बढ़ाना, और (घ) समूची शिक्षा प्रणाली की योजना, प्रशासन और प्रबंधन में सुधार करना। कमिटी सभी शिक्षण संस्थानों के बिजलीकरण का सुझाव देती है, चूंकि बिजली तकनीक आधारित कार्यक्रमों की पूर्व शर्त है। इसके अतिरिक्त उसने निम्नलिखित का सुझाव दिया:
 

सूचना एवं संचार तकनीक के जरिए राष्ट्रीय शिक्षा अभियान: अभियान में वर्चुअल प्रयोगशालाएं शामिल हैं जिनके जरिए विभिन्न विषयों की प्रयोगशालाओं का दूर बैठे भी फायदा उठाया जा सकता है। इस अभियान के अंतर्गत राष्ट्रीय शिक्षा तकनीकी मंच का गठन भी किया जाएगा। यह एक स्वायत्त निकाय होगा और तकनीक को शुरू, स्थापित और प्रयोग करने से संबंधित फैसले लेने में मदद करेगा। यह मंच तकनीक आधारित कार्यक्रमों के संबंध में केंद्र और राज्य सरकारों को प्रमाण आधारित परामर्श देगा।
 

शिक्षा संबंधी आंकड़ों पर राष्ट्रीय रेपोजिटरी: राष्ट्रीय रेपोजिटरी की स्थापना की जाएगी। इसका मुख्य कार्य संस्थानों, शिक्षकों और विद्यार्थियों से संबंधित रिकॉर्ड्स का डिजिटल प्रारूप में रखरखाव करना होगा। इसके अतिरिक्त एक सिंगल ऑनलाइन डिजिटल रेपोजिटरी बनाई जाएगी जहां कॉपीराइट मुक्त शैक्षणिक संसाधन विभिन्न भाषाओं में उपलब्ध होंगे।

व्यावसायिक शिक्षा

कमिटी ने कहा कि 19-24 आयु वर्ग के 5% से भी कम श्रम बल को भारत में व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त होती है। इसके विपरीत यूएसए में 52%, जर्मनी में 75% और दक्षिण कोरिया में 96% युवाओं को व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त होती है। कमिटी ने सुझाव दिया कि 10 वर्षों की अवधि में चरणबद्ध तरीके से सभी शिक्षण संस्थानों (स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालयों) में व्यावसायिक शिक्षण कार्यक्रमों को एकीकृत किया जाना चाहिए। उल्लेखनीय है कि यह दक्षता विकास और उद्यमिता पर राष्ट्रीय नीति (2015) का अपवर्ड संशोधन है जिसका लक्ष्य 25% शिक्षण संस्थानों में व्यावसायिक शिक्षा प्रस्तावित करना था। इस संबंध में मुख्य सुझाव निम्न हैं:
 

व्यावसायिक पाठ्यक्रम: नौवीं से 12 वीं कक्षा के बीच के सभी स्कूली विद्यार्थियों को कम से कम एक व्यवसाय में व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त होनी चाहिए। प्रस्तावित स्कूल परिसरों की करिकुलम डिलिवरी विशेषज्ञता से लैस होनी चाहिए और यह मौजूदा नेशनल स्किल्स क्वालिफिकेशंस फ्रेमवर्क के दक्षता के स्तर के अनुकूल होनी चाहिए।
 

प्रस्तावित उच्च शिक्षण संस्थानों को ऐसे व्यावसायिक पाठ्यक्रम भी शुरू करने चाहिए जोकि अंडरग्रैजुएट शिक्षण कार्यक्रमों में एकीकृत हैं। मसौदा नीति का लक्ष्य यह है कि 2025 तक उच्च शिक्षण संस्थानों में दाखिला लेने वाले अधिकतम 50% विद्यार्थियों को व्यावसायिक शिक्षा उपलब्ध कराई जाए। इस समय इन संस्थानों के 10% से भी कम विद्यार्थियों को यह सुविधा उपलब्ध है।   
 

व्यावयासिक शिक्षा के एकीकरण के लिए राष्ट्रीय कमिटी: एक राष्ट्रीय कमिटी का गठन किया जाएगा ताकि इन लक्ष्यों को हासिल करने से संबंधित जरूरी कदमों पर कार्य किया जा सके। शिक्षण संस्थानों में व्यावसायिक शिक्षा के एकीकरण के लिए एक फंड की स्थापना की जाएगी। इस धनराशि के संवितरण का क्या तरीका होगा, कमिटी इस पर कार्य करेगी।

प्रौढ़ शिक्षा

जनगणना 2011 के अनुसार भारत में अब भी युवा निरक्षरों (15-24 वर्ष) की संख्या 3.26 करोड़ और वयस्क निरक्षरों (15 वर्ष और उससे अधिक) की संख्या 26.5 करोड़ है। इस संबंध में मसौदा नीति निम्नलिखित सुझाव देती है:
 

एनसीईआरटी के अंतर्गत एक घटक इकाई के रूप में केंद्रीय प्रौढ़ शिक्षा संस्थान की स्थापना की जाए। यह एक स्वायत्त संस्थान होगा जोकि प्रौढ़ शिक्षा के लिए राष्ट्रीय करिकुलम फ्रेमवर्क विकसित करेगा। इस फ्रेमवर्क में पांच व्यापक क्षेत्र शामिल होंगे: मूलभूत साक्षरता और संख्या ज्ञान, महत्वपूर्ण जीवन कौशल, व्यावसायिक दक्षता विकास, बुनियादी शिक्षा और सतत शिक्षा।
 

प्रौढ़ शिक्षा केद्रों को प्रस्तावित स्कूल परिसरों में शामिल किया जाएगा। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओपन स्कूलिंग में युवाओं और प्रौढ़ों के लिए संबंधित पाठ्यक्रमों को उपलब्ध कराया जाएगा। हाल ही प्रारंभ किए गए नेशनल ऑडिट ट्यूटर्स प्रोग्राम के जरिए प्रौढ़ शिक्षा के प्रशिक्षकों और प्रबंधकों का कैडर तथा वन-टू-वन ट्यूटर्स की टीम बनाई जाएगी।

 
राष्ट्रीय शिक्षा नीति का मसौदा तैयार करने के लिए मानव संसाधन मंत्रालय ने जून 2017 में एक कमिटी (डॉ. के. कस्तूरीरंगन) का गठन किया गया था। इस कमिटी ने 31 मई, 2019 को अपनी रिपोर्ट सौंपी। रिपोर्ट शिक्षा नीति को प्रस्तावित करती है। यह नीति मौजूदा शिक्षा प्रणाली की निम्नलिखित चुनौतियों को लक्षित करती है: (i) पहुंच, (ii) समानता, (iii) क्वालिटी, (iv) वहन करने योग्य, और (v) जवाबदेही।
 

मसौदा नीति स्कूल से लेकर उच्च शिक्षा के सभी स्तरों में सुधार का प्रावधान करती है। यह बचपन में प्रारंभिक देखभाल पर अधिक ध्यान देने, मौजूदा परीक्षा प्रणाली में सुधार करने, शिक्षकों के प्रशिक्षण को मजबूत करने तथा शिक्षा के रेगुलेटरी फ्रेमवर्क को दोबारा बनाने का प्रयास करती है। मसौदा नीति इस बात का भी प्रयास करती है कि राष्ट्रीय शिक्षा आयोग का गठन किया जाए, शिक्षा में सरकारी निवेश बढ़ाया जाए, तकनीक के प्रयोग को मजबूत किया जाए और व्यावसायिक एवं प्रौढ़ शिक्षा पर अधिक ध्यान दिया जाए, इत्यादि। मसौदा नीति के मुख्य निष्कर्षों और सुझावों में निम्न शामिल हैं:

स्कूली शिक्षा

बचपन में प्रारंभिक देखभाल और शिक्षा: शिक्षा तक पहुंच न होने के अतिरिक्त कमिटी ने यह गौर किया कि मौजूदा शिक्षण कार्यक्रमों में भी क्वालिटी संबंधी अनेक कमियां हैं। इनमें निम्नलिखित शामिल हैं: (i) ऐसे करिकुलम जो बच्चे की विकास संबंधी जरूरतों को पूरा नहीं करते, (ii) क्वालिफाइड और प्रशिक्षित शिक्षकों का अभाव, और (iii) शिक्षण का निम्न स्तर। वर्तमान में आंगनवाड़ियों और निजी प्री-स्कूलों के जरिए अधिकतर बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा प्रदान की जाती है। हालांकि प्रारंभिक देखभाल में शैक्षणिक पहलु पर कम ध्यान दिया जाता है। इसीलिए मसौदा नीति में प्रारंभिक देखभाल और शिक्षा के लिए दो स्तरीय करिकुलम विकसित करने का सुझाव दिया गया है। इसमें निम्नलिखित शामिल हैं: (i) तीन वर्ष तक के बच्चों के लिए दिशानिर्देश (ये दिशानिर्देश माता-पिता और शिक्षकों के लिए हैं), और (ii) तीन से आठ वर्ष के बच्चों के लिए शिक्षा संबंधी फ्रेमवर्क। इन्हें लागू करने के लिए आंगनवाड़ी प्रणाली में सुधार किया जाए और उन्हें व्यापक बनाया जाए, तथा आंगनवाड़ियों को प्राथमिक स्कूलों के परिसर में शिफ्ट किया जाए।
 

शिक्षा का अधिकार एक्ट, 2009 (आरटीई एक्ट) : वर्तमान में आरटीई एक्ट छह से 14 वर्ष तक के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान करता है। मसौदा नीति इस बात का सुझाव देती है कि आरटीई के दायरे को बढ़ाया जाए ताकि बचपन की प्रारंभिक शिक्षा और माध्यमिक स्कूली शिक्षा को इसमें शामिल किया जा सके। इससे एक्ट के दायरे में तीन से 18 वर्ष तक के बच्चे शामिल हो जाएंगे।
 

इसके अतिरिक्त कमिटी ने सुझाव दिया है कि आरटीई एक्ट में निरंतर और व्यापक मूल्यांकन तथा नो डिटेंशन पॉलिसी से संबंधित संशोधनों की समीक्षा की जाए। कमिटी ने कहा कि कक्षा आठ तक के बच्चों को फेल नहीं किया जाना चाहिए। इसके बजाय स्कूलों को सुनिश्चित करना चाहिए कि बच्चों को उनकी आयु के अनुकूल उचित स्तर की शिक्षा प्राप्त हो रही है।
 

करिकुलम का फ्रेमवर्क: बच्चों की विकास संबंधी जरूरतों को देखते हुए स्कूली शिक्षा की मौजूदा संरचना को एक बार फिर से बनाया जाना चाहिए। इसका डिजाइन 5-3-3-4 के आधार पर तैयार किया जाना चाहिए जिनमें निम्नलिखित शामिल हों: (i) पांच वर्ष का आधारभूत चरण (तीन वर्ष की प्री-प्राइमरी और कक्षा एक और दो), (ii) तैयारी के तीन वर्ष- कक्षा तीन से पांच), (iii) माध्यमिक चरण के तीन वर्ष (कक्षा छह से आठ), और (iv) माध्यमिक चरण के चार वर्ष (कक्षा नौ से 12)।
 

कमिटी ने कहा कि मौजूदा शिक्षा प्रणाली का पूरा ध्यान सिर्फ तथ्यों और प्रक्रियाओं के रटने पर केंद्रित है। इसलिए उसने सुझाव दिया कि प्रत्येक विषय में करिकुलम का भार कम किया जाए और जरूरी मुख्य कंटेंट पर ही ध्यान दिया जाए। इससे समग्र, चर्चा और चर्चा आधारित शिक्षा के लिए गुंजाइश बनेगी।
 

स्कूलों की परीक्षाओं में सुधार: कमिटी ने कहा कि मौजूदा बोर्ड परीक्षाओं के कारण: (i) बच्चे कुछ ही विषयों पर ध्यान केंद्रित करते हैं, (ii) शिक्षण की रचनात्मक तरीके से परीक्षा नहीं हो पाती, और (iii) विद्यार्थियों को तनाव होता है। स्कूल में बच्चे की प्रगति की निगरानी करने के लिए मसौदा नीति में कक्षा तीन, पांच और आठ में राज्य सेंसस परीक्षाओं का प्रस्ताव है। इसके अतिरिक्त कमिटी ने केवल मुख्य कॉन्सेप्ट्स, कौशल और उच्च श्रेणी की दक्षता की जांच के लिए बोर्ड परीक्षाओं के पुनर्गठन का सुझाव दिया है। इससे विद्यार्थी अनेक प्रकार के विषयों की परीक्षाएं दे पाएंगे। वे अपने विषय और सेमिस्टर चुनेंगे, ताकि वे तब परीक्षा दें, जब देना चाहें। ये परीक्षाएं स्कूलों की अपनी फाइनल परीक्षाओं का स्थान लेंगी।
 

स्कूल का इंफ्रास्ट्रक्चर: कमिटी ने कहा कि देश के हर इलाके में प्राथमिक स्कूल बनाने से शिक्षा तक लोगों की पहुंच बढ़ी है। हालांकि इससे बहुत छोटे स्कूल भी स्थापित किए गए हैं (जहां विद्यार्थियों की संख्या बहुत कम है)। स्कूल छोटे होने से उसे संचालित करना मुश्किल होता है। इसका असर शिक्षकों की तैनाती और भौतिक संसाधनों की उपलब्धता पर पड़ता है। इसलिए मसौदा नीति यह सुझाव देती है कि कई सरकारी स्कूलों को मिलाकर एक स्कूल परिसर बनाया जाए। एक परिसर में एक माध्यमिक स्कूल (कक्षा नौ से बारह) और आस-पड़ोस के ऐसे सभी सरकारी स्कूल आने चाहिए जोकि प्री-प्राइमरी से लेकर कक्षा आठ तक की शिक्षा प्रदान करते हैं।
 

स्कूल परिसरों में आंगनवाड़ियां, व्यावसायिक शिक्षा केंद्र और प्रौढ़ शिक्षा केंद्र भी शामिल होंगे। प्रत्येक स्कूल परिसर एक अर्ध स्वायत्त इकाई होगी, जिसमें बाल्यावस्था से लेकर माध्यमिक शिक्षा- यानी शिक्षा के सभी चरणों में एकीकृत शिक्षा प्रदान करेंगी। इससे यह सुनिश्चित होगा कि संसाधनों, जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर और प्रशिक्षित शिक्षकों को स्कूल परिसर में प्रभावी रूप से साझा किया जा सके।
 

शिक्षकों का प्रबंधन: कमिटी ने कहा कि शिक्षकों की संख्या कम है और पेशेवर तौर पर प्रशिक्षित शिक्षकों का भी अभाव है। साथ ही गैर शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए शिक्षकों की तैनाती की जाती है। मसौदा नीति में सुझाव दिया गया है कि एक शिक्षक को एक स्कूल परिसर में कम से कम पांच से सात वर्ष तक तैनात किया जाए। इसके अतिरिक्त शिक्षकों को स्कूली घंटों के दौरान गैर शैक्षणिक गतिविधियों में भाग लेने (जैसे मिड डे मील पकाने या टीकाकरण अभियानों में हिस्सा लेने) की अनुमति नहीं होगी जोकि उनकी शिक्षण क्षमताओं को प्रभावित कर सकती है।
 

शिक्षकों के शिक्षण के लिए मौजूदा बी.एड. प्रोग्राम को चार वर्ष के एकीकृत बी.एड. प्रोग्राम से रिप्लेस किया जाएगा जिसमें उच्च क्वालिटी का कंटेंट, शिक्षण का स्तर, और व्यावहरिक प्रशिक्षण शामिल होगा। सभी विषयों के लिए निरंतर एकीकृत पेशेवर विकास को भी विकसित किया जाएगा। शिक्षकों से हर वर्ष न्यूनतम 50 घंटे के निरंतर पेशेवर विकास प्रशिक्षण को पूरा करने की अपेक्षा की जाएगी।  
 

स्कूलों का रेगुलेशन: मसौदा नीति स्कूलों के रेगुलेशन को नीति निर्धारण, स्कूल के संचालन और शैक्षणिक विकास जैसे पहलुओं से अलग करने का सुझाव देती है। इसमें सुझाव दिया गया है कि प्रत्येक राज्य के लिए एक स्वतंत्र राज्य स्कूल रेगुलेटरी अथॉरिटी की स्थापना की जाए जो सरकारी और निजी स्कूलों के लिए बुनियादी यूनिफॉर्म स्टैंडर्ड्स को निर्धारित करेगी। राज्य के शिक्षा विभाग नीतियां बनाएंगे और निरीक्षण करेंगे।

उच्च शिक्षा

अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में उच्च शिक्षा में सकल दाखिला अनुपात (जीईआर) 2011-12 में 20.8% से बढ़कर 2017-18 में 25.8% हो गया।

तालिका 1: विभिन्न देशों में जीईआर के बीच तुलना (2014)

 

प्राथमिक (कक्षा 1-5)

उच्च प्राथमिक (कक्षा 6-8)

उच्च माध्यमिक (कक्षा 9-12)

उच्च शिक्षा

भारत

101.4

89.3

62.5

23

चीन

103.9

100.4

88.8

39.4

यूएसए

99.5

101.9

93.2

86.7

जर्मनी

103.3

101.6

104.6

65.5

Source: Educational Statistics at Glance (2016), MHRD; PRS.

कमिटी ने कहा कि देश में उच्च शिक्षा में निम्न दाखिले का मुख्य कारण यह है कि उस तक लोगों की पहुंच नहीं है। उसने जीईआर के 25.8% के मौजूदा स्तर को 2035 तक 50% करने का लक्ष्य निर्धारित किया। इस संबंध में मुख्य सुझावों में निम्नलिखित शामिल हैं:
 

रेगुलेटरी संरचना और एक्रेडेशन: कमिटी ने कहा कि मौजूदा उच्च शिक्षा प्रणाली में बहुत से रेगुलेटर हैं और उनके मैन्डेट्स ओवरलैप होते हैं। इससे उच्च शिक्षण संस्थानों की स्वायत्तता पर असर होता है और निर्भरता तथा केंद्रीकृत नीति निर्धारण का वातावरण तैयार होता है। इसलिए कमिटी ने राष्ट्रीय उच्च शिक्षा रेगुलेटरी अथॉरिटी (एनएचईआरए) की स्थापना का प्रस्ताव रखा। यह स्वतंत्र अथॉरिटी उच्च शिक्षा के रेगुलेटरों का स्थान लेगी जिसमें पेशेवर और व्यावासियक शिक्षा के रेगुलेटर भी शामिल हैं। इसका अर्थ यह है कि सभी पेशेवर परिषदों, जैसे एआईसीटीई और भारतीय बार काउंसिल की भूमिका केवल पेशेवर प्रैक्टिस के लिए मानदंड बनाने तक सीमित हो जाएगी। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) का काम भी केवल उच्च शिक्षण संस्थानों को अनुदान देने तक सीमित होगा।
 

वर्तमान में नेशनल एसेसमेंट एंड एक्रेडेशन काउंसिल (एनएएसी) एक एक्रेडेटड निकाय है जो यूजीसी के अंतर्गत आती है। मसौदा नीति ने एनएएसी को यूजीसी से अलग करके एक स्वतंत्र और स्वायत्त निकाय बनाने का सुझाव दिया है। इस भूमिका में एनएएसी टॉप लेवल की एक्रेडेटर के तौर पर काम करेगी और विभिन्न एक्रेडिटेशन संस्थानों को लाइसेंस जारी करेगी जोकि उच्च शिक्षण संस्थानों का हर पांच से सात वर्षों में एक बार मूल्यांकन करेगी। सभी मौजूदा शिक्षण संस्थानों का एक्रेडेशन 2030 तक हो जाना चाहिए।
 

नए उच्च शिक्षण संस्थानों की स्थापना: वर्तमान में उच्च शिक्षण संस्थान केवल संसद या राज्य कानूनों के जरिए स्थापित किए जा सकते हैं। मसौदा नीति प्रस्तावित करती है कि इन संस्थानों को एनएचईआरए से हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन चार्टर के जरिए स्थापित करने की अनुमति दी जा सकती है। इस चार्टर को कुछ विशिष्ट मानदंडों के पारदर्शी मूल्यांकन के आधार पर प्रदान किया जाएगा। सभी नए उच्च शिक्षण संस्थानों को स्थापना के पांच वर्षों के भीतर एनएचईआरए से एक्रेडेशन हासिल हो जाना चाहिए।
 

उच्च शिक्षण संस्थानों का पुनर्गठन: उच्च शिक्षण संस्थानों को तीन श्रेणियों में पुनर्गठित किया जाएगा: (i) शोध विश्वविद्यालय जोकि शोध और शिक्षण दोनों पर ध्यान केंद्रित करेंगे, (ii) शिक्षण विश्वविद्यालय जोकि शिक्षण पर मुख्य रूप से ध्यान केंद्रित करेंगे लेकिन महत्वपूर्ण शोध भी करेंगे, और (iii) कॉलेज, जोकि केवल अंडरग्रैजुएट शिक्षा देंगे। धीरे-धीरे इन सभी को पूर्ण शैक्षणिक, प्रशासनिक और वित्तीय स्वायत्तता दी जाएगी।
 

राष्ट्रीय शोध प्रतिष्ठान की स्थापना: कमिटी ने गौर किया कि भारत में शोध और नवाचार में कुल निवेश 2008 में 0.84% के मुकाबले गिरकर 2014 में 0.69% रह गया। भारत दूसरे देशों की तुलना में शोधार्थियों (प्रति लाख आबादी में), पेटेंट्स और पब्लिकेशंस के लिहाज से भी पिछड़ा हुआ है।

तालिका 2: शोध और नवाचार में निवेश

 

शोध और नवाचार में निवेश (जीडीपी का %)

शोधकर्ता (प्रति लाख जनसंख्या)

पेटेंट्स के कुल आवेदन

भारत

0.7

15

45,057

चीन

2.1

111

13,38,503

यूएसए

2.8

423

605,571

इज़राइल

4.3

825

6,419

Source: Economic Survey of India 2017-18; PRS

मसौदा नीति राष्ट्रीय शोध प्रतिष्ठान की स्थापना का सुझाव देती है जोकि एक स्वायत्त निकाय होगा ताकि भारत में उच्च स्तरीय शोध के लिए फंडिंग, मेंटरिंग और क्षमता निर्माण किया जा सके। प्रतिष्ठान के चार प्रमुख प्रभाग होंगे: विज्ञान, तकनीक, सामाजिक विज्ञान और आर्ट्स एवं ह्यूमैनिटीज़। इसमें और प्रभाग जोड़े जा सकते हैं। प्रतिष्ठान को 20,000 करोड़ रुपए (जीडीपी का 0.1%) का वार्षिक अनुदान प्रदान किया जाएगा।
 

उदार दृष्टिकोण की ओर बढ़ना: मसौदा नीति सुझाव देती है कि अंडरग्रैजुएट प्रोग्राम्स को बहुअनुशासनिक (इंटरडिसिपलिनरी) बनाया जाए। इसके लिए इनके करिकुलम को दोबारा बनाना होगा ताकि निम्नलिखित को शामिल किया जा सके: (क) एक समान मुख्य करिकुलम और (ख) स्पेशलाइजेशन के एक/दो क्षेत्र। विद्यार्थियों को स्पेशलाइजेशन के लिए एक क्षेत्र को ‘मेजर’ और वैकल्पिक क्षेत्र को ‘माइनर’ के तौर पर चुनना होगा। लिबरल आर्ट्स में चार साल के अंडरग्रैजुएट प्रोग्रम्स शुरू किए जाएंगे और विद्यार्थियों को उचित सर्टिफिकेशन के साथ एक से अधिक निकास विकल्प (एक्जिट ऑप्शन्स) मुहैय्या कराए जाएंगे। इसके अतिरिक्त अगले पांच वर्षों में लिबरल आर्ट्स के पांच भारतीय संस्थानों को बहुअनुशासनिक लिबरल आर्ट्स के मॉडल संस्थानों के रूप में स्थापित किया जाना चाहिए।
 

फैकेल्टी का प्रोफेशनल विकास: कमिटी ने गौर किया कि उच्च शिक्षण संस्थानों में काम करने की खराब स्थितियां और शिक्षण के अत्यधिक दबाव से शिक्षकों का मनोबल गिरा है। इसके अतिरिक्त स्वायत्तता की कमी और करियर में प्रगति की व्यवस्थित प्रणाली न होने का भी असर हुआ है। मसौदा नीति सुझाव देती है कि सभी उच्च शिक्षण संस्थानों में 2030 तक फैकेल्टी के लिए निरंतर पेशेवर विकास कार्यक्रम विकसित किया जाए और स्थायी रोजगार (टैन्योर) ट्रैक प्रणाली की शुरुआत की जाए। इसके अतिरिक्त अधिकतम 30:1 के विद्यार्थी-शिक्षक अनुपात को सुनिश्चित किया जाए।
 

सीखने का श्रेष्ठ माहौल: कमिटी ने कहा कि करिकुलम गैर लचीला, संकुचित और पुराना है। हालांकि फैकेल्टी के पास अक्सर करिकुलम डिजाइन करने की स्वायत्तता नहीं होती जिसका शिक्षण के स्तर पर नकारात्मक असर होता है। कमिटी ने सुझाव दिया था कि सभी उच्च शिक्षण संस्थानों को करिकुलम, शिक्षण और संसाधन से संबंधित मामलों में पूरी स्वायत्तता मिलनी चाहिए।

शिक्षा में गवर्नेंस

कमिटी ने कहा कि शिक्षा में गवर्नेस की मौजूदा प्रणाली पर पुनर्विचार तथा विभिन्न मंत्रालयों, विभागों और संस्थाओं के बीच सिनर्जी एवं समन्वय कायम करने की जरूरत है। इस संबंध में कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए हैं:
 

प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में राष्ट्रीय शिक्षा आयोग की स्थापना जोकि शिक्षा का एपेक्स निकाय होगा। यह निकाय निरंतर और सतत आधार पर देश में शिक्षा के दृष्टिकोण को विकसित करने, उसे लागू करने, उसका मूल्यांकन करने और उस पर पुनर्विचार करने के लिए जिम्मेदार होगा। वह राष्ट्रीय शिक्षा अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी), प्रस्तावित राष्ट्रीय उच्च शिक्षा रेगुलेटरी अथॉरिटी तथा राष्ट्रीय शोध प्रतिष्ठान सहित अनेक निकायों के कामकाज और उनके कार्यान्वयन की निगरानी करेगा।
 

मानव संसाधन और विकास मंत्रालय को दोबारा शिक्षा मंत्रालय नाम दिया जाना चाहिए ताकि शिक्षा पर फिर से ध्यान केंद्रित किया जा सके।

शिक्षा का वित्त पोषण

मसौदा नीति ने शिक्षा में 6% सरकारी व्यय की प्रतिबद्धता को दोहराया। उल्लेखनीय है कि पहली राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 1968 ने शिक्षा में जीडीपी के 6% व्यय का सुझाव दिया था जिसे 1986 में दूसरे एनईपी ने दोहराया था। 2017-18 में भारत में शिक्षा पर सरकारी व्यय जीडीपी का 2.7% था।

तालिका 3: शिक्षा में कुल सार्वजनिक निवेश

देश

2017 में निवेश (जीडीपी के % के रूप में)

भारत

2.7

यूएसए

5

यूके

5.5

ब्राजील

6

शिक्षा पर कुल सार्वजनिक व्यय 10% है। मसौदा नीति इस दर को अगले 10 वर्षों में दोगुना करके 20% करने का प्रयास करती है। अतिरिक्त 10% में से 5% विश्वविद्यालयों और कॉलेजों (उच्च शिक्षा) पर खर्च किया जाएगा, 2% अतिरिक्त स्कूली शिक्षा में शिक्षकों की लागत या संसाधनों पर और 1.4% बच्चों की शुरुआती देखभाल और शिक्षा पर खर्च किया जाएगा।
 

कमिटी ने परिचालनगत समस्याओं और धनराशि के वितरण में लीकेज पर गौर किया। उदाहरण के लिए यह गौर किया गया कि जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थानों में लगभग 45% रिक्तियां हैं जिनके कारण उनके आबंटनों का इस्तेमाल नहीं किया गया या प्रभावी तरीके से इस्तेमाल नहीं हुआ। कमिटी ने संस्थागत विकास योजनाओं के जरिए धनराशि के अधिकतम और यथासमय उपयोग का सुझाव दिया।

शिक्षा में तकनीक

कमिटी ने गौर किया कि तकनीक निम्नलिखित में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है: (क) कक्षाओं में सीखने, सिखाने और मूल्यांकन की प्रक्रिया में सुधार करना, (ख) शिक्षकों को तैयार करने और उनके निरंतर पेशेवर विकास में सहायता देना, (ग) सुदूर क्षेत्रों तथा वंचित समूहों में शिक्षा तक पहुंच बढ़ाना, और (घ) समूची शिक्षा प्रणाली की योजना, प्रशासन और प्रबंधन में सुधार करना। कमिटी सभी शिक्षण संस्थानों के बिजलीकरण का सुझाव देती है, चूंकि बिजली तकनीक आधारित कार्यक्रमों की पूर्व शर्त है। इसके अतिरिक्त उसने निम्नलिखित का सुझाव दिया:
 

सूचना एवं संचार तकनीक के जरिए राष्ट्रीय शिक्षा अभियान: अभियान में वर्चुअल प्रयोगशालाएं शामिल हैं जिनके जरिए विभिन्न विषयों की प्रयोगशालाओं का दूर बैठे भी फायदा उठाया जा सकता है। इस अभियान के अंतर्गत राष्ट्रीय शिक्षा तकनीकी मंच का गठन भी किया जाएगा। यह एक स्वायत्त निकाय होगा और तकनीक को शुरू, स्थापित और प्रयोग करने से संबंधित फैसले लेने में मदद करेगा। यह मंच तकनीक आधारित कार्यक्रमों के संबंध में केंद्र और राज्य सरकारों को प्रमाण आधारित परामर्श देगा।
 

शिक्षा संबंधी आंकड़ों पर राष्ट्रीय रेपोजिटरी: राष्ट्रीय रेपोजिटरी की स्थापना की जाएगी। इसका मुख्य कार्य संस्थानों, शिक्षकों और विद्यार्थियों से संबंधित रिकॉर्ड्स का डिजिटल प्रारूप में रखरखाव करना होगा। इसके अतिरिक्त एक सिंगल ऑनलाइन डिजिटल रेपोजिटरी बनाई जाएगी जहां कॉपीराइट मुक्त शैक्षणिक संसाधन विभिन्न भाषाओं में उपलब्ध होंगे।

व्यावसायिक शिक्षा

कमिटी ने कहा कि 19-24 आयु वर्ग के 5% से भी कम श्रम बल को भारत में व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त होती है। इसके विपरीत यूएसए में 52%, जर्मनी में 75% और दक्षिण कोरिया में 96% युवाओं को व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त होती है। कमिटी ने सुझाव दिया कि 10 वर्षों की अवधि में चरणबद्ध तरीके से सभी शिक्षण संस्थानों (स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालयों) में व्यावसायिक शिक्षण कार्यक्रमों को एकीकृत किया जाना चाहिए। उल्लेखनीय है कि यह दक्षता विकास और उद्यमिता पर राष्ट्रीय नीति (2015) का अपवर्ड संशोधन है जिसका लक्ष्य 25% शिक्षण संस्थानों में व्यावसायिक शिक्षा प्रस्तावित करना था। इस संबंध में मुख्य सुझाव निम्न हैं:
 

व्यावसायिक पाठ्यक्रम: नौवीं से 12 वीं कक्षा के बीच के सभी स्कूली विद्यार्थियों को कम से कम एक व्यवसाय में व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त होनी चाहिए। प्रस्तावित स्कूल परिसरों की करिकुलम डिलिवरी विशेषज्ञता से लैस होनी चाहिए और यह मौजूदा नेशनल स्किल्स क्वालिफिकेशंस फ्रेमवर्क के दक्षता के स्तर के अनुकूल होनी चाहिए।
 

प्रस्तावित उच्च शिक्षण संस्थानों को ऐसे व्यावसायिक पाठ्यक्रम भी शुरू करने चाहिए जोकि अंडरग्रैजुएट शिक्षण कार्यक्रमों में एकीकृत हैं। मसौदा नीति का लक्ष्य यह है कि 2025 तक उच्च शिक्षण संस्थानों में दाखिला लेने वाले अधिकतम 50% विद्यार्थियों को व्यावसायिक शिक्षा उपलब्ध कराई जाए। इस समय इन संस्थानों के 10% से भी कम विद्यार्थियों को यह सुविधा उपलब्ध है।   
 

व्यावयासिक शिक्षा के एकीकरण के लिए राष्ट्रीय कमिटी: एक राष्ट्रीय कमिटी का गठन किया जाएगा ताकि इन लक्ष्यों को हासिल करने से संबंधित जरूरी कदमों पर कार्य किया जा सके। शिक्षण संस्थानों में व्यावसायिक शिक्षा के एकीकरण के लिए एक फंड की स्थापना की जाएगी। इस धनराशि के संवितरण का क्या तरीका होगा, कमिटी इस पर कार्य करेगी।

प्रौढ़ शिक्षा

जनगणना 2011 के अनुसार भारत में अब भी युवा निरक्षरों (15-24 वर्ष) की संख्या 3.26 करोड़ और वयस्क निरक्षरों (15 वर्ष और उससे अधिक) की संख्या 26.5 करोड़ है। इस संबंध में मसौदा नीति निम्नलिखित सुझाव देती है:
 

एनसीईआरटी के अंतर्गत एक घटक इकाई के रूप में केंद्रीय प्रौढ़ शिक्षा संस्थान की स्थापना की जाए। यह एक स्वायत्त संस्थान होगा जोकि प्रौढ़ शिक्षा के लिए राष्ट्रीय करिकुलम फ्रेमवर्क विकसित करेगा। इस फ्रेमवर्क में पांच व्यापक क्षेत्र शामिल होंगे: मूलभूत साक्षरता और संख्या ज्ञान, महत्वपूर्ण जीवन कौशल, व्यावसायिक दक्षता विकास, बुनियादी शिक्षा और सतत शिक्षा।
 

प्रौढ़ शिक्षा केद्रों को प्रस्तावित स्कूल परिसरों में शामिल किया जाएगा। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओपन स्कूलिंग में युवाओं और प्रौढ़ों के लिए संबंधित पाठ्यक्रमों को उपलब्ध कराया जाएगा। हाल ही प्रारंभ किए गए नेशनल ऑडिट ट्यूटर्स प्रोग्राम के जरिए प्रौढ़ शिक्षा के प्रशिक्षकों और प्रबंधकों का कैडर तथा वन-टू-वन ट्यूटर्स की टीम बनाई जाएगी।

 
राष्ट्रीय शिक्षा नीति का मसौदा तैयार करने के लिए मानव संसाधन मंत्रालय ने जून 2017 में एक कमिटी (डॉ. के. कस्तूरीरंगन) का गठन किया गया था। इस कमिटी ने 31 मई, 2019 को अपनी रिपोर्ट सौंपी। रिपोर्ट शिक्षा नीति को प्रस्तावित करती है। यह नीति मौजूदा शिक्षा प्रणाली की निम्नलिखित चुनौतियों को लक्षित करती है: (i) पहुंच, (ii) समानता, (iii) क्वालिटी, (iv) वहन करने योग्य, और (v) जवाबदेही।
 

मसौदा नीति स्कूल से लेकर उच्च शिक्षा के सभी स्तरों में सुधार का प्रावधान करती है। यह बचपन में प्रारंभिक देखभाल पर अधिक ध्यान देने, मौजूदा परीक्षा प्रणाली में सुधार करने, शिक्षकों के प्रशिक्षण को मजबूत करने तथा शिक्षा के रेगुलेटरी फ्रेमवर्क को दोबारा बनाने का प्रयास करती है। मसौदा नीति इस बात का भी प्रयास करती है कि राष्ट्रीय शिक्षा आयोग का गठन किया जाए, शिक्षा में सरकारी निवेश बढ़ाया जाए, तकनीक के प्रयोग को मजबूत किया जाए और व्यावसायिक एवं प्रौढ़ शिक्षा पर अधिक ध्यान दिया जाए, इत्यादि। मसौदा नीति के मुख्य निष्कर्षों और सुझावों में निम्न शामिल हैं:

स्कूली शिक्षा

बचपन में प्रारंभिक देखभाल और शिक्षा: शिक्षा तक पहुंच न होने के अतिरिक्त कमिटी ने यह गौर किया कि मौजूदा शिक्षण कार्यक्रमों में भी क्वालिटी संबंधी अनेक कमियां हैं। इनमें निम्नलिखित शामिल हैं: (i) ऐसे करिकुलम जो बच्चे की विकास संबंधी जरूरतों को पूरा नहीं करते, (ii) क्वालिफाइड और प्रशिक्षित शिक्षकों का अभाव, और (iii) शिक्षण का निम्न स्तर। वर्तमान में आंगनवाड़ियों और निजी प्री-स्कूलों के जरिए अधिकतर बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा प्रदान की जाती है। हालांकि प्रारंभिक देखभाल में शैक्षणिक पहलु पर कम ध्यान दिया जाता है। इसीलिए मसौदा नीति में प्रारंभिक देखभाल और शिक्षा के लिए दो स्तरीय करिकुलम विकसित करने का सुझाव दिया गया है। इसमें निम्नलिखित शामिल हैं: (i) तीन वर्ष तक के बच्चों के लिए दिशानिर्देश (ये दिशानिर्देश माता-पिता और शिक्षकों के लिए हैं), और (ii) तीन से आठ वर्ष के बच्चों के लिए शिक्षा संबंधी फ्रेमवर्क। इन्हें लागू करने के लिए आंगनवाड़ी प्रणाली में सुधार किया जाए और उन्हें व्यापक बनाया जाए, तथा आंगनवाड़ियों को प्राथमिक स्कूलों के परिसर में शिफ्ट किया जाए।
 

शिक्षा का अधिकार एक्ट, 2009 (आरटीई एक्ट) : वर्तमान में आरटीई एक्ट छह से 14 वर्ष तक के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान करता है। मसौदा नीति इस बात का सुझाव देती है कि आरटीई के दायरे को बढ़ाया जाए ताकि बचपन की प्रारंभिक शिक्षा और माध्यमिक स्कूली शिक्षा को इसमें शामिल किया जा सके। इससे एक्ट के दायरे में तीन से 18 वर्ष तक के बच्चे शामिल हो जाएंगे।
 

इसके अतिरिक्त कमिटी ने सुझाव दिया है कि आरटीई एक्ट में निरंतर और व्यापक मूल्यांकन तथा नो डिटेंशन पॉलिसी से संबंधित संशोधनों की समीक्षा की जाए। कमिटी ने कहा कि कक्षा आठ तक के बच्चों को फेल नहीं किया जाना चाहिए। इसके बजाय स्कूलों को सुनिश्चित करना चाहिए कि बच्चों को उनकी आयु के अनुकूल उचित स्तर की शिक्षा प्राप्त हो रही है।
 

करिकुलम का फ्रेमवर्क: बच्चों की विकास संबंधी जरूरतों को देखते हुए स्कूली शिक्षा की मौजूदा संरचना को एक बार फिर से बनाया जाना चाहिए। इसका डिजाइन 5-3-3-4 के आधार पर तैयार किया जाना चाहिए जिनमें निम्नलिखित शामिल हों: (i) पांच वर्ष का आधारभूत चरण (तीन वर्ष की प्री-प्राइमरी और कक्षा एक और दो), (ii) तैयारी के तीन वर्ष- कक्षा तीन से पांच), (iii) माध्यमिक चरण के तीन वर्ष (कक्षा छह से आठ), और (iv) माध्यमिक चरण के चार वर्ष (कक्षा नौ से 12)।
 

कमिटी ने कहा कि मौजूदा शिक्षा प्रणाली का पूरा ध्यान सिर्फ तथ्यों और प्रक्रियाओं के रटने पर केंद्रित है। इसलिए उसने सुझाव दिया कि प्रत्येक विषय में करिकुलम का भार कम किया जाए और जरूरी मुख्य कंटेंट पर ही ध्यान दिया जाए। इससे समग्र, चर्चा और चर्चा आधारित शिक्षा के लिए गुंजाइश बनेगी।
 

स्कूलों की परीक्षाओं में सुधार: कमिटी ने कहा कि मौजूदा बोर्ड परीक्षाओं के कारण: (i) बच्चे कुछ ही विषयों पर ध्यान केंद्रित करते हैं, (ii) शिक्षण की रचनात्मक तरीके से परीक्षा नहीं हो पाती, और (iii) विद्यार्थियों को तनाव होता है। स्कूल में बच्चे की प्रगति की निगरानी करने के लिए मसौदा नीति में कक्षा तीन, पांच और आठ में राज्य सेंसस परीक्षाओं का प्रस्ताव है। इसके अतिरिक्त कमिटी ने केवल मुख्य कॉन्सेप्ट्स, कौशल और उच्च श्रेणी की दक्षता की जांच के लिए बोर्ड परीक्षाओं के पुनर्गठन का सुझाव दिया है। इससे विद्यार्थी अनेक प्रकार के विषयों की परीक्षाएं दे पाएंगे। वे अपने विषय और सेमिस्टर चुनेंगे, ताकि वे तब परीक्षा दें, जब देना चाहें। ये परीक्षाएं स्कूलों की अपनी फाइनल परीक्षाओं का स्थान लेंगी।
 

स्कूल का इंफ्रास्ट्रक्चर: कमिटी ने कहा कि देश के हर इलाके में प्राथमिक स्कूल बनाने से शिक्षा तक लोगों की पहुंच बढ़ी है। हालांकि इससे बहुत छोटे स्कूल भी स्थापित किए गए हैं (जहां विद्यार्थियों की संख्या बहुत कम है)। स्कूल छोटे होने से उसे संचालित करना मुश्किल होता है। इसका असर शिक्षकों की तैनाती और भौतिक संसाधनों की उपलब्धता पर पड़ता है। इसलिए मसौदा नीति यह सुझाव देती है कि कई सरकारी स्कूलों को मिलाकर एक स्कूल परिसर बनाया जाए। एक परिसर में एक माध्यमिक स्कूल (कक्षा नौ से बारह) और आस-पड़ोस के ऐसे सभी सरकारी स्कूल आने चाहिए जोकि प्री-प्राइमरी से लेकर कक्षा आठ तक की शिक्षा प्रदान करते हैं।
 

स्कूल परिसरों में आंगनवाड़ियां, व्यावसायिक शिक्षा केंद्र और प्रौढ़ शिक्षा केंद्र भी शामिल होंगे। प्रत्येक स्कूल परिसर एक अर्ध स्वायत्त इकाई होगी, जिसमें बाल्यावस्था से लेकर माध्यमिक शिक्षा- यानी शिक्षा के सभी चरणों में एकीकृत शिक्षा प्रदान करेंगी। इससे यह सुनिश्चित होगा कि संसाधनों, जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर और प्रशिक्षित शिक्षकों को स्कूल परिसर में प्रभावी रूप से साझा किया जा सके।
 

शिक्षकों का प्रबंधन: कमिटी ने कहा कि शिक्षकों की संख्या कम है और पेशेवर तौर पर प्रशिक्षित शिक्षकों का भी अभाव है। साथ ही गैर शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए शिक्षकों की तैनाती की जाती है। मसौदा नीति में सुझाव दिया गया है कि एक शिक्षक को एक स्कूल परिसर में कम से कम पांच से सात वर्ष तक तैनात किया जाए। इसके अतिरिक्त शिक्षकों को स्कूली घंटों के दौरान गैर शैक्षणिक गतिविधियों में भाग लेने (जैसे मिड डे मील पकाने या टीकाकरण अभियानों में हिस्सा लेने) की अनुमति नहीं होगी जोकि उनकी शिक्षण क्षमताओं को प्रभावित कर सकती है।
 

शिक्षकों के शिक्षण के लिए मौजूदा बी.एड. प्रोग्राम को चार वर्ष के एकीकृत बी.एड. प्रोग्राम से रिप्लेस किया जाएगा जिसमें उच्च क्वालिटी का कंटेंट, शिक्षण का स्तर, और व्यावहरिक प्रशिक्षण शामिल होगा। सभी विषयों के लिए निरंतर एकीकृत पेशेवर विकास को भी विकसित किया जाएगा। शिक्षकों से हर वर्ष न्यूनतम 50 घंटे के निरंतर पेशेवर विकास प्रशिक्षण को पूरा करने की अपेक्षा की जाएगी।  
 

स्कूलों का रेगुलेशन: मसौदा नीति स्कूलों के रेगुलेशन को नीति निर्धारण, स्कूल के संचालन और शैक्षणिक विकास जैसे पहलुओं से अलग करने का सुझाव देती है। इसमें सुझाव दिया गया है कि प्रत्येक राज्य के लिए एक स्वतंत्र राज्य स्कूल रेगुलेटरी अथॉरिटी की स्थापना की जाए जो सरकारी और निजी स्कूलों के लिए बुनियादी यूनिफॉर्म स्टैंडर्ड्स को निर्धारित करेगी। राज्य के शिक्षा विभाग नीतियां बनाएंगे और निरीक्षण करेंगे।

उच्च शिक्षा

अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में उच्च शिक्षा में सकल दाखिला अनुपात (जीईआर) 2011-12 में 20.8% से बढ़कर 2017-18 में 25.8% हो गया।

तालिका 1: विभिन्न देशों में जीईआर के बीच तुलना (2014)

 

प्राथमिक (कक्षा 1-5)

उच्च प्राथमिक (कक्षा 6-8)

उच्च माध्यमिक (कक्षा 9-12)

उच्च शिक्षा

भारत

101.4

89.3

62.5

23

चीन

103.9

100.4

88.8

39.4

यूएसए

99.5

101.9

93.2

86.7

जर्मनी

103.3

101.6

104.6

65.5

Source: Educational Statistics at Glance (2016), MHRD; PRS.

कमिटी ने कहा कि देश में उच्च शिक्षा में निम्न दाखिले का मुख्य कारण यह है कि उस तक लोगों की पहुंच नहीं है। उसने जीईआर के 25.8% के मौजूदा स्तर को 2035 तक 50% करने का लक्ष्य निर्धारित किया। इस संबंध में मुख्य सुझावों में निम्नलिखित शामिल हैं:
 

रेगुलेटरी संरचना और एक्रेडेशन: कमिटी ने कहा कि मौजूदा उच्च शिक्षा प्रणाली में बहुत से रेगुलेटर हैं और उनके मैन्डेट्स ओवरलैप होते हैं। इससे उच्च शिक्षण संस्थानों की स्वायत्तता पर असर होता है और निर्भरता तथा केंद्रीकृत नीति निर्धारण का वातावरण तैयार होता है। इसलिए कमिटी ने राष्ट्रीय उच्च शिक्षा रेगुलेटरी अथॉरिटी (एनएचईआरए) की स्थापना का प्रस्ताव रखा। यह स्वतंत्र अथॉरिटी उच्च शिक्षा के रेगुलेटरों का स्थान लेगी जिसमें पेशेवर और व्यावासियक शिक्षा के रेगुलेटर भी शामिल हैं। इसका अर्थ यह है कि सभी पेशेवर परिषदों, जैसे एआईसीटीई और भारतीय बार काउंसिल की भूमिका केवल पेशेवर प्रैक्टिस के लिए मानदंड बनाने तक सीमित हो जाएगी। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) का काम भी केवल उच्च शिक्षण संस्थानों को अनुदान देने तक सीमित होगा।
 

वर्तमान में नेशनल एसेसमेंट एंड एक्रेडेशन काउंसिल (एनएएसी) एक एक्रेडेटड निकाय है जो यूजीसी के अंतर्गत आती है। मसौदा नीति ने एनएएसी को यूजीसी से अलग करके एक स्वतंत्र और स्वायत्त निकाय बनाने का सुझाव दिया है। इस भूमिका में एनएएसी टॉप लेवल की एक्रेडेटर के तौर पर काम करेगी और विभिन्न एक्रेडिटेशन संस्थानों को लाइसेंस जारी करेगी जोकि उच्च शिक्षण संस्थानों का हर पांच से सात वर्षों में एक बार मूल्यांकन करेगी। सभी मौजूदा शिक्षण संस्थानों का एक्रेडेशन 2030 तक हो जाना चाहिए।
 

नए उच्च शिक्षण संस्थानों की स्थापना: वर्तमान में उच्च शिक्षण संस्थान केवल संसद या राज्य कानूनों के जरिए स्थापित किए जा सकते हैं। मसौदा नीति प्रस्तावित करती है कि इन संस्थानों को एनएचईआरए से हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन चार्टर के जरिए स्थापित करने की अनुमति दी जा सकती है। इस चार्टर को कुछ विशिष्ट मानदंडों के पारदर्शी मूल्यांकन के आधार पर प्रदान किया जाएगा। सभी नए उच्च शिक्षण संस्थानों को स्थापना के पांच वर्षों के भीतर एनएचईआरए से एक्रेडेशन हासिल हो जाना चाहिए।
 

उच्च शिक्षण संस्थानों का पुनर्गठन: उच्च शिक्षण संस्थानों को तीन श्रेणियों में पुनर्गठित किया जाएगा: (i) शोध विश्वविद्यालय जोकि शोध और शिक्षण दोनों पर ध्यान केंद्रित करेंगे, (ii) शिक्षण विश्वविद्यालय जोकि शिक्षण पर मुख्य रूप से ध्यान केंद्रित करेंगे लेकिन महत्वपूर्ण शोध भी करेंगे, और (iii) कॉलेज, जोकि केवल अंडरग्रैजुएट शिक्षा देंगे। धीरे-धीरे इन सभी को पूर्ण शैक्षणिक, प्रशासनिक और वित्तीय स्वायत्तता दी जाएगी।
 

राष्ट्रीय शोध प्रतिष्ठान की स्थापना: कमिटी ने गौर किया कि भारत में शोध और नवाचार में कुल निवेश 2008 में 0.84% के मुकाबले गिरकर 2014 में 0.69% रह गया। भारत दूसरे देशों की तुलना में शोधार्थियों (प्रति लाख आबादी में), पेटेंट्स और पब्लिकेशंस के लिहाज से भी पिछड़ा हुआ है।

तालिका 2: शोध और नवाचार में निवेश

 

शोध और नवाचार में निवेश (जीडीपी का %)

शोधकर्ता (प्रति लाख जनसंख्या)

पेटेंट्स के कुल आवेदन

भारत

0.7

15

45,057

चीन

2.1

111

13,38,503

यूएसए

2.8

423

605,571

इज़राइल

4.3

825

6,419

Source: Economic Survey of India 2017-18; PRS

मसौदा नीति राष्ट्रीय शोध प्रतिष्ठान की स्थापना का सुझाव देती है जोकि एक स्वायत्त निकाय होगा ताकि भारत में उच्च स्तरीय शोध के लिए फंडिंग, मेंटरिंग और क्षमता निर्माण किया जा सके। प्रतिष्ठान के चार प्रमुख प्रभाग होंगे: विज्ञान, तकनीक, सामाजिक विज्ञान और आर्ट्स एवं ह्यूमैनिटीज़। इसमें और प्रभाग जोड़े जा सकते हैं। प्रतिष्ठान को 20,000 करोड़ रुपए (जीडीपी का 0.1%) का वार्षिक अनुदान प्रदान किया जाएगा।
 

उदार दृष्टिकोण की ओर बढ़ना: मसौदा नीति सुझाव देती है कि अंडरग्रैजुएट प्रोग्राम्स को बहुअनुशासनिक (इंटरडिसिपलिनरी) बनाया जाए। इसके लिए इनके करिकुलम को दोबारा बनाना होगा ताकि निम्नलिखित को शामिल किया जा सके: (क) एक समान मुख्य करिकुलम और (ख) स्पेशलाइजेशन के एक/दो क्षेत्र। विद्यार्थियों को स्पेशलाइजेशन के लिए एक क्षेत्र को ‘मेजर’ और वैकल्पिक क्षेत्र को ‘माइनर’ के तौर पर चुनना होगा। लिबरल आर्ट्स में चार साल के अंडरग्रैजुएट प्रोग्रम्स शुरू किए जाएंगे और विद्यार्थियों को उचित सर्टिफिकेशन के साथ एक से अधिक निकास विकल्प (एक्जिट ऑप्शन्स) मुहैय्या कराए जाएंगे। इसके अतिरिक्त अगले पांच वर्षों में लिबरल आर्ट्स के पांच भारतीय संस्थानों को बहुअनुशासनिक लिबरल आर्ट्स के मॉडल संस्थानों के रूप में स्थापित किया जाना चाहिए।
 

फैकेल्टी का प्रोफेशनल विकास: कमिटी ने गौर किया कि उच्च शिक्षण संस्थानों में काम करने की खराब स्थितियां और शिक्षण के अत्यधिक दबाव से शिक्षकों का मनोबल गिरा है। इसके अतिरिक्त स्वायत्तता की कमी और करियर में प्रगति की व्यवस्थित प्रणाली न होने का भी असर हुआ है। मसौदा नीति सुझाव देती है कि सभी उच्च शिक्षण संस्थानों में 2030 तक फैकेल्टी के लिए निरंतर पेशेवर विकास कार्यक्रम विकसित किया जाए और स्थायी रोजगार (टैन्योर) ट्रैक प्रणाली की शुरुआत की जाए। इसके अतिरिक्त अधिकतम 30:1 के विद्यार्थी-शिक्षक अनुपात को सुनिश्चित किया जाए।
 

सीखने का श्रेष्ठ माहौल: कमिटी ने कहा कि करिकुलम गैर लचीला, संकुचित और पुराना है। हालांकि फैकेल्टी के पास अक्सर करिकुलम डिजाइन करने की स्वायत्तता नहीं होती जिसका शिक्षण के स्तर पर नकारात्मक असर होता है। कमिटी ने सुझाव दिया था कि सभी उच्च शिक्षण संस्थानों को करिकुलम, शिक्षण और संसाधन से संबंधित मामलों में पूरी स्वायत्तता मिलनी चाहिए।

शिक्षा में गवर्नेंस

कमिटी ने कहा कि शिक्षा में गवर्नेस की मौजूदा प्रणाली पर पुनर्विचार तथा विभिन्न मंत्रालयों, विभागों और संस्थाओं के बीच सिनर्जी एवं समन्वय कायम करने की जरूरत है। इस संबंध में कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए हैं:
 

प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में राष्ट्रीय शिक्षा आयोग की स्थापना जोकि शिक्षा का एपेक्स निकाय होगा। यह निकाय निरंतर और सतत आधार पर देश में शिक्षा के दृष्टिकोण को विकसित करने, उसे लागू करने, उसका मूल्यांकन करने और उस पर पुनर्विचार करने के लिए जिम्मेदार होगा। वह राष्ट्रीय शिक्षा अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी), प्रस्तावित राष्ट्रीय उच्च शिक्षा रेगुलेटरी अथॉरिटी तथा राष्ट्रीय शोध प्रतिष्ठान सहित अनेक निकायों के कामकाज और उनके कार्यान्वयन की निगरानी करेगा।
 

मानव संसाधन और विकास मंत्रालय को दोबारा शिक्षा मंत्रालय नाम दिया जाना चाहिए ताकि शिक्षा पर फिर से ध्यान केंद्रित किया जा सके।

शिक्षा का वित्त पोषण

मसौदा नीति ने शिक्षा में 6% सरकारी व्यय की प्रतिबद्धता को दोहराया। उल्लेखनीय है कि पहली राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 1968 ने शिक्षा में जीडीपी के 6% व्यय का सुझाव दिया था जिसे 1986 में दूसरे एनईपी ने दोहराया था। 2017-18 में भारत में शिक्षा पर सरकारी व्यय जीडीपी का 2.7% था।

तालिका 3: शिक्षा में कुल सार्वजनिक निवेश

देश

2017 में निवेश (जीडीपी के % के रूप में)

भारत

2.7

यूएसए

5

यूके

5.5

ब्राजील

6

शिक्षा पर कुल सार्वजनिक व्यय 10% है। मसौदा नीति इस दर को अगले 10 वर्षों में दोगुना करके 20% करने का प्रयास करती है। अतिरिक्त 10% में से 5% विश्वविद्यालयों और कॉलेजों (उच्च शिक्षा) पर खर्च किया जाएगा, 2% अतिरिक्त स्कूली शिक्षा में शिक्षकों की लागत या संसाधनों पर और 1.4% बच्चों की शुरुआती देखभाल और शिक्षा पर खर्च किया जाएगा।
 

कमिटी ने परिचालनगत समस्याओं और धनराशि के वितरण में लीकेज पर गौर किया। उदाहरण के लिए यह गौर किया गया कि जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थानों में लगभग 45% रिक्तियां हैं जिनके कारण उनके आबंटनों का इस्तेमाल नहीं किया गया या प्रभावी तरीके से इस्तेमाल नहीं हुआ। कमिटी ने संस्थागत विकास योजनाओं के जरिए धनराशि के अधिकतम और यथासमय उपयोग का सुझाव दिया।

शिक्षा में तकनीक

कमिटी ने गौर किया कि तकनीक निम्नलिखित में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है: (क) कक्षाओं में सीखने, सिखाने और मूल्यांकन की प्रक्रिया में सुधार करना, (ख) शिक्षकों को तैयार करने और उनके निरंतर पेशेवर विकास में सहायता देना, (ग) सुदूर क्षेत्रों तथा वंचित समूहों में शिक्षा तक पहुंच बढ़ाना, और (घ) समूची शिक्षा प्रणाली की योजना, प्रशासन और प्रबंधन में सुधार करना। कमिटी सभी शिक्षण संस्थानों के बिजलीकरण का सुझाव देती है, चूंकि बिजली तकनीक आधारित कार्यक्रमों की पूर्व शर्त है। इसके अतिरिक्त उसने निम्नलिखित का सुझाव दिया:
 

सूचना एवं संचार तकनीक के जरिए राष्ट्रीय शिक्षा अभियान: अभियान में वर्चुअल प्रयोगशालाएं शामिल हैं जिनके जरिए विभिन्न विषयों की प्रयोगशालाओं का दूर बैठे भी फायदा उठाया जा सकता है। इस अभियान के अंतर्गत राष्ट्रीय शिक्षा तकनीकी मंच का गठन भी किया जाएगा। यह एक स्वायत्त निकाय होगा और तकनीक को शुरू, स्थापित और प्रयोग करने से संबंधित फैसले लेने में मदद करेगा। यह मंच तकनीक आधारित कार्यक्रमों के संबंध में केंद्र और राज्य सरकारों को प्रमाण आधारित परामर्श देगा।
 

शिक्षा संबंधी आंकड़ों पर राष्ट्रीय रेपोजिटरी: राष्ट्रीय रेपोजिटरी की स्थापना की जाएगी। इसका मुख्य कार्य संस्थानों, शिक्षकों और विद्यार्थियों से संबंधित रिकॉर्ड्स का डिजिटल प्रारूप में रखरखाव करना होगा। इसके अतिरिक्त एक सिंगल ऑनलाइन डिजिटल रेपोजिटरी बनाई जाएगी जहां कॉपीराइट मुक्त शैक्षणिक संसाधन विभिन्न भाषाओं में उपलब्ध होंगे।

व्यावसायिक शिक्षा

कमिटी ने कहा कि 19-24 आयु वर्ग के 5% से भी कम श्रम बल को भारत में व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त होती है। इसके विपरीत यूएसए में 52%, जर्मनी में 75% और दक्षिण कोरिया में 96% युवाओं को व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त होती है। कमिटी ने सुझाव दिया कि 10 वर्षों की अवधि में चरणबद्ध तरीके से सभी शिक्षण संस्थानों (स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालयों) में व्यावसायिक शिक्षण कार्यक्रमों को एकीकृत किया जाना चाहिए। उल्लेखनीय है कि यह दक्षता विकास और उद्यमिता पर राष्ट्रीय नीति (2015) का अपवर्ड संशोधन है जिसका लक्ष्य 25% शिक्षण संस्थानों में व्यावसायिक शिक्षा प्रस्तावित करना था। इस संबंध में मुख्य सुझाव निम्न हैं:
 

व्यावसायिक पाठ्यक्रम: नौवीं से 12 वीं कक्षा के बीच के सभी स्कूली विद्यार्थियों को कम से कम एक व्यवसाय में व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त होनी चाहिए। प्रस्तावित स्कूल परिसरों की करिकुलम डिलिवरी विशेषज्ञता से लैस होनी चाहिए और यह मौजूदा नेशनल स्किल्स क्वालिफिकेशंस फ्रेमवर्क के दक्षता के स्तर के अनुकूल होनी चाहिए।
 

प्रस्तावित उच्च शिक्षण संस्थानों को ऐसे व्यावसायिक पाठ्यक्रम भी शुरू करने चाहिए जोकि अंडरग्रैजुएट शिक्षण कार्यक्रमों में एकीकृत हैं। मसौदा नीति का लक्ष्य यह है कि 2025 तक उच्च शिक्षण संस्थानों में दाखिला लेने वाले अधिकतम 50% विद्यार्थियों को व्यावसायिक शिक्षा उपलब्ध कराई जाए। इस समय इन संस्थानों के 10% से भी कम विद्यार्थियों को यह सुविधा उपलब्ध है।   
 

व्यावयासिक शिक्षा के एकीकरण के लिए राष्ट्रीय कमिटी: एक राष्ट्रीय कमिटी का गठन किया जाएगा ताकि इन लक्ष्यों को हासिल करने से संबंधित जरूरी कदमों पर कार्य किया जा सके। शिक्षण संस्थानों में व्यावसायिक शिक्षा के एकीकरण के लिए एक फंड की स्थापना की जाएगी। इस धनराशि के संवितरण का क्या तरीका होगा, कमिटी इस पर कार्य करेगी।

प्रौढ़ शिक्षा

जनगणना 2011 के अनुसार भारत में अब भी युवा निरक्षरों (15-24 वर्ष) की संख्या 3.26 करोड़ और वयस्क निरक्षरों (15 वर्ष और उससे अधिक) की संख्या 26.5 करोड़ है। इस संबंध में मसौदा नीति निम्नलिखित सुझाव देती है:
 

एनसीईआरटी के अंतर्गत एक घटक इकाई के रूप में केंद्रीय प्रौढ़ शिक्षा संस्थान की स्थापना की जाए। यह एक स्वायत्त संस्थान होगा जोकि प्रौढ़ शिक्षा के लिए राष्ट्रीय करिकुलम फ्रेमवर्क विकसित करेगा। इस फ्रेमवर्क में पांच व्यापक क्षेत्र शामिल होंगे: मूलभूत साक्षरता और संख्या ज्ञान, महत्वपूर्ण जीवन कौशल, व्यावसायिक दक्षता विकास, बुनियादी शिक्षा और सतत शिक्षा।
 

प्रौढ़ शिक्षा केद्रों को प्रस्तावित स्कूल परिसरों में शामिल किया जाएगा। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओपन स्कूलिंग में युवाओं और प्रौढ़ों के लिए संबंधित पाठ्यक्रमों को उपलब्ध कराया जाएगा। हाल ही प्रारंभ किए गए नेशनल ऑडिट ट्यूटर्स प्रोग्राम के जरिए प्रौढ़ शिक्षा के प्रशिक्षकों और प्रबंधकों का कैडर तथा वन-टू-वन ट्यूटर्स की टीम बनाई जाएगी।

 
राष्ट्रीय शिक्षा नीति का मसौदा तैयार करने के लिए मानव संसाधन मंत्रालय ने जून 2017 में एक कमिटी (डॉ. के. कस्तूरीरंगन) का गठन किया गया था। इस कमिटी ने 31 मई, 2019 को अपनी रिपोर्ट सौंपी। रिपोर्ट शिक्षा नीति को प्रस्तावित करती है। यह नीति मौजूदा शिक्षा प्रणाली की निम्नलिखित चुनौतियों को लक्षित करती है: (i) पहुंच, (ii) समानता, (iii) क्वालिटी, (iv) वहन करने योग्य, और (v) जवाबदेही।
 

मसौदा नीति स्कूल से लेकर उच्च शिक्षा के सभी स्तरों में सुधार का प्रावधान करती है। यह बचपन में प्रारंभिक देखभाल पर अधिक ध्यान देने, मौजूदा परीक्षा प्रणाली में सुधार करने, शिक्षकों के प्रशिक्षण को मजबूत करने तथा शिक्षा के रेगुलेटरी फ्रेमवर्क को दोबारा बनाने का प्रयास करती है। मसौदा नीति इस बात का भी प्रयास करती है कि राष्ट्रीय शिक्षा आयोग का गठन किया जाए, शिक्षा में सरकारी निवेश बढ़ाया जाए, तकनीक के प्रयोग को मजबूत किया जाए और व्यावसायिक एवं प्रौढ़ शिक्षा पर अधिक ध्यान दिया जाए, इत्यादि। मसौदा नीति के मुख्य निष्कर्षों और सुझावों में निम्न शामिल हैं:

स्कूली शिक्षा

बचपन में प्रारंभिक देखभाल और शिक्षा: शिक्षा तक पहुंच न होने के अतिरिक्त कमिटी ने यह गौर किया कि मौजूदा शिक्षण कार्यक्रमों में भी क्वालिटी संबंधी अनेक कमियां हैं। इनमें निम्नलिखित शामिल हैं: (i) ऐसे करिकुलम जो बच्चे की विकास संबंधी जरूरतों को पूरा नहीं करते, (ii) क्वालिफाइड और प्रशिक्षित शिक्षकों का अभाव, और (iii) शिक्षण का निम्न स्तर। वर्तमान में आंगनवाड़ियों और निजी प्री-स्कूलों के जरिए अधिकतर बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा प्रदान की जाती है। हालांकि प्रारंभिक देखभाल में शैक्षणिक पहलु पर कम ध्यान दिया जाता है। इसीलिए मसौदा नीति में प्रारंभिक देखभाल और शिक्षा के लिए दो स्तरीय करिकुलम विकसित करने का सुझाव दिया गया है। इसमें निम्नलिखित शामिल हैं: (i) तीन वर्ष तक के बच्चों के लिए दिशानिर्देश (ये दिशानिर्देश माता-पिता और शिक्षकों के लिए हैं), और (ii) तीन से आठ वर्ष के बच्चों के लिए शिक्षा संबंधी फ्रेमवर्क। इन्हें लागू करने के लिए आंगनवाड़ी प्रणाली में सुधार किया जाए और उन्हें व्यापक बनाया जाए, तथा आंगनवाड़ियों को प्राथमिक स्कूलों के परिसर में शिफ्ट किया जाए।
 

शिक्षा का अधिकार एक्ट, 2009 (आरटीई एक्ट) : वर्तमान में आरटीई एक्ट छह से 14 वर्ष तक के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान करता है। मसौदा नीति इस बात का सुझाव देती है कि आरटीई के दायरे को बढ़ाया जाए ताकि बचपन की प्रारंभिक शिक्षा और माध्यमिक स्कूली शिक्षा को इसमें शामिल किया जा सके। इससे एक्ट के दायरे में तीन से 18 वर्ष तक के बच्चे शामिल हो जाएंगे।
 

इसके अतिरिक्त कमिटी ने सुझाव दिया है कि आरटीई एक्ट में निरंतर और व्यापक मूल्यांकन तथा नो डिटेंशन पॉलिसी से संबंधित संशोधनों की समीक्षा की जाए। कमिटी ने कहा कि कक्षा आठ तक के बच्चों को फेल नहीं किया जाना चाहिए। इसके बजाय स्कूलों को सुनिश्चित करना चाहिए कि बच्चों को उनकी आयु के अनुकूल उचित स्तर की शिक्षा प्राप्त हो रही है।
 

करिकुलम का फ्रेमवर्क: बच्चों की विकास संबंधी जरूरतों को देखते हुए स्कूली शिक्षा की मौजूदा संरचना को एक बार फिर से बनाया जाना चाहिए। इसका डिजाइन 5-3-3-4 के आधार पर तैयार किया जाना चाहिए जिनमें निम्नलिखित शामिल हों: (i) पांच वर्ष का आधारभूत चरण (तीन वर्ष की प्री-प्राइमरी और कक्षा एक और दो), (ii) तैयारी के तीन वर्ष- कक्षा तीन से पांच), (iii) माध्यमिक चरण के तीन वर्ष (कक्षा छह से आठ), और (iv) माध्यमिक चरण के चार वर्ष (कक्षा नौ से 12)।
 

कमिटी ने कहा कि मौजूदा शिक्षा प्रणाली का पूरा ध्यान सिर्फ तथ्यों और प्रक्रियाओं के रटने पर केंद्रित है। इसलिए उसने सुझाव दिया कि प्रत्येक विषय में करिकुलम का भार कम किया जाए और जरूरी मुख्य कंटेंट पर ही ध्यान दिया जाए। इससे समग्र, चर्चा और चर्चा आधारित शिक्षा के लिए गुंजाइश बनेगी।
 

स्कूलों की परीक्षाओं में सुधार: कमिटी ने कहा कि मौजूदा बोर्ड परीक्षाओं के कारण: (i) बच्चे कुछ ही विषयों पर ध्यान केंद्रित करते हैं, (ii) शिक्षण की रचनात्मक तरीके से परीक्षा नहीं हो पाती, और (iii) विद्यार्थियों को तनाव होता है। स्कूल में बच्चे की प्रगति की निगरानी करने के लिए मसौदा नीति में कक्षा तीन, पांच और आठ में राज्य सेंसस परीक्षाओं का प्रस्ताव है। इसके अतिरिक्त कमिटी ने केवल मुख्य कॉन्सेप्ट्स, कौशल और उच्च श्रेणी की दक्षता की जांच के लिए बोर्ड परीक्षाओं के पुनर्गठन का सुझाव दिया है। इससे विद्यार्थी अनेक प्रकार के विषयों की परीक्षाएं दे पाएंगे। वे अपने विषय और सेमिस्टर चुनेंगे, ताकि वे तब परीक्षा दें, जब देना चाहें। ये परीक्षाएं स्कूलों की अपनी फाइनल परीक्षाओं का स्थान लेंगी।
 

स्कूल का इंफ्रास्ट्रक्चर: कमिटी ने कहा कि देश के हर इलाके में प्राथमिक स्कूल बनाने से शिक्षा तक लोगों की पहुंच बढ़ी है। हालांकि इससे बहुत छोटे स्कूल भी स्थापित किए गए हैं (जहां विद्यार्थियों की संख्या बहुत कम है)। स्कूल छोटे होने से उसे संचालित करना मुश्किल होता है। इसका असर शिक्षकों की तैनाती और भौतिक संसाधनों की उपलब्धता पर पड़ता है। इसलिए मसौदा नीति यह सुझाव देती है कि कई सरकारी स्कूलों को मिलाकर एक स्कूल परिसर बनाया जाए। एक परिसर में एक माध्यमिक स्कूल (कक्षा नौ से बारह) और आस-पड़ोस के ऐसे सभी सरकारी स्कूल आने चाहिए जोकि प्री-प्राइमरी से लेकर कक्षा आठ तक की शिक्षा प्रदान करते हैं।
 

स्कूल परिसरों में आंगनवाड़ियां, व्यावसायिक शिक्षा केंद्र और प्रौढ़ शिक्षा केंद्र भी शामिल होंगे। प्रत्येक स्कूल परिसर एक अर्ध स्वायत्त इकाई होगी, जिसमें बाल्यावस्था से लेकर माध्यमिक शिक्षा- यानी शिक्षा के सभी चरणों में एकीकृत शिक्षा प्रदान करेंगी। इससे यह सुनिश्चित होगा कि संसाधनों, जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर और प्रशिक्षित शिक्षकों को स्कूल परिसर में प्रभावी रूप से साझा किया जा सके।
 

शिक्षकों का प्रबंधन: कमिटी ने कहा कि शिक्षकों की संख्या कम है और पेशेवर तौर पर प्रशिक्षित शिक्षकों का भी अभाव है। साथ ही गैर शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए शिक्षकों की तैनाती की जाती है। मसौदा नीति में सुझाव दिया गया है कि एक शिक्षक को एक स्कूल परिसर में कम से कम पांच से सात वर्ष तक तैनात किया जाए। इसके अतिरिक्त शिक्षकों को स्कूली घंटों के दौरान गैर शैक्षणिक गतिविधियों में भाग लेने (जैसे मिड डे मील पकाने या टीकाकरण अभियानों में हिस्सा लेने) की अनुमति नहीं होगी जोकि उनकी शिक्षण क्षमताओं को प्रभावित कर सकती है।
 

शिक्षकों के शिक्षण के लिए मौजूदा बी.एड. प्रोग्राम को चार वर्ष के एकीकृत बी.एड. प्रोग्राम से रिप्लेस किया जाएगा जिसमें उच्च क्वालिटी का कंटेंट, शिक्षण का स्तर, और व्यावहरिक प्रशिक्षण शामिल होगा। सभी विषयों के लिए निरंतर एकीकृत पेशेवर विकास को भी विकसित किया जाएगा। शिक्षकों से हर वर्ष न्यूनतम 50 घंटे के निरंतर पेशेवर विकास प्रशिक्षण को पूरा करने की अपेक्षा की जाएगी।  
 

स्कूलों का रेगुलेशन: मसौदा नीति स्कूलों के रेगुलेशन को नीति निर्धारण, स्कूल के संचालन और शैक्षणिक विकास जैसे पहलुओं से अलग करने का सुझाव देती है। इसमें सुझाव दिया गया है कि प्रत्येक राज्य के लिए एक स्वतंत्र राज्य स्कूल रेगुलेटरी अथॉरिटी की स्थापना की जाए जो सरकारी और निजी स्कूलों के लिए बुनियादी यूनिफॉर्म स्टैंडर्ड्स को निर्धारित करेगी। राज्य के शिक्षा विभाग नीतियां बनाएंगे और निरीक्षण करेंगे।

उच्च शिक्षा

अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में उच्च शिक्षा में सकल दाखिला अनुपात (जीईआर) 2011-12 में 20.8% से बढ़कर 2017-18 में 25.8% हो गया।

तालिका 1: विभिन्न देशों में जीईआर के बीच तुलना (2014)

 

प्राथमिक (कक्षा 1-5)

उच्च प्राथमिक (कक्षा 6-8)

उच्च माध्यमिक (कक्षा 9-12)

उच्च शिक्षा

भारत

101.4

89.3

62.5

23

चीन

103.9

100.4

88.8

39.4

यूएसए

99.5

101.9

93.2

86.7

जर्मनी

103.3

101.6

104.6

65.5

Source: Educational Statistics at Glance (2016), MHRD; PRS.

कमिटी ने कहा कि देश में उच्च शिक्षा में निम्न दाखिले का मुख्य कारण यह है कि उस तक लोगों की पहुंच नहीं है। उसने जीईआर के 25.8% के मौजूदा स्तर को 2035 तक 50% करने का लक्ष्य निर्धारित किया। इस संबंध में मुख्य सुझावों में निम्नलिखित शामिल हैं:
 

रेगुलेटरी संरचना और एक्रेडेशन: कमिटी ने कहा कि मौजूदा उच्च शिक्षा प्रणाली में बहुत से रेगुलेटर हैं और उनके मैन्डेट्स ओवरलैप होते हैं। इससे उच्च शिक्षण संस्थानों की स्वायत्तता पर असर होता है और निर्भरता तथा केंद्रीकृत नीति निर्धारण का वातावरण तैयार होता है। इसलिए कमिटी ने राष्ट्रीय उच्च शिक्षा रेगुलेटरी अथॉरिटी (एनएचईआरए) की स्थापना का प्रस्ताव रखा। यह स्वतंत्र अथॉरिटी उच्च शिक्षा के रेगुलेटरों का स्थान लेगी जिसमें पेशेवर और व्यावासियक शिक्षा के रेगुलेटर भी शामिल हैं। इसका अर्थ यह है कि सभी पेशेवर परिषदों, जैसे एआईसीटीई और भारतीय बार काउंसिल की भूमिका केवल पेशेवर प्रैक्टिस के लिए मानदंड बनाने तक सीमित हो जाएगी। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) का काम भी केवल उच्च शिक्षण संस्थानों को अनुदान देने तक सीमित होगा।
 

वर्तमान में नेशनल एसेसमेंट एंड एक्रेडेशन काउंसिल (एनएएसी) एक एक्रेडेटड निकाय है जो यूजीसी के अंतर्गत आती है। मसौदा नीति ने एनएएसी को यूजीसी से अलग करके एक स्वतंत्र और स्वायत्त निकाय बनाने का सुझाव दिया है। इस भूमिका में एनएएसी टॉप लेवल की एक्रेडेटर के तौर पर काम करेगी और विभिन्न एक्रेडिटेशन संस्थानों को लाइसेंस जारी करेगी जोकि उच्च शिक्षण संस्थानों का हर पांच से सात वर्षों में एक बार मूल्यांकन करेगी। सभी मौजूदा शिक्षण संस्थानों का एक्रेडेशन 2030 तक हो जाना चाहिए।
 

नए उच्च शिक्षण संस्थानों की स्थापना: वर्तमान में उच्च शिक्षण संस्थान केवल संसद या राज्य कानूनों के जरिए स्थापित किए जा सकते हैं। मसौदा नीति प्रस्तावित करती है कि इन संस्थानों को एनएचईआरए से हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन चार्टर के जरिए स्थापित करने की अनुमति दी जा सकती है। इस चार्टर को कुछ विशिष्ट मानदंडों के पारदर्शी मूल्यांकन के आधार पर प्रदान किया जाएगा। सभी नए उच्च शिक्षण संस्थानों को स्थापना के पांच वर्षों के भीतर एनएचईआरए से एक्रेडेशन हासिल हो जाना चाहिए।
 

उच्च शिक्षण संस्थानों का पुनर्गठन: उच्च शिक्षण संस्थानों को तीन श्रेणियों में पुनर्गठित किया जाएगा: (i) शोध विश्वविद्यालय जोकि शोध और शिक्षण दोनों पर ध्यान केंद्रित करेंगे, (ii) शिक्षण विश्वविद्यालय जोकि शिक्षण पर मुख्य रूप से ध्यान केंद्रित करेंगे लेकिन महत्वपूर्ण शोध भी करेंगे, और (iii) कॉलेज, जोकि केवल अंडरग्रैजुएट शिक्षा देंगे। धीरे-धीरे इन सभी को पूर्ण शैक्षणिक, प्रशासनिक और वित्तीय स्वायत्तता दी जाएगी।
 

राष्ट्रीय शोध प्रतिष्ठान की स्थापना: कमिटी ने गौर किया कि भारत में शोध और नवाचार में कुल निवेश 2008 में 0.84% के मुकाबले गिरकर 2014 में 0.69% रह गया। भारत दूसरे देशों की तुलना में शोधार्थियों (प्रति लाख आबादी में), पेटेंट्स और पब्लिकेशंस के लिहाज से भी पिछड़ा हुआ है।

तालिका 2: शोध और नवाचार में निवेश

 

शोध और नवाचार में निवेश (जीडीपी का %)

शोधकर्ता (प्रति लाख जनसंख्या)

पेटेंट्स के कुल आवेदन

भारत

0.7

15

45,057

चीन

2.1

111

13,38,503

यूएसए

2.8

423

605,571

इज़राइल

4.3

825

6,419

Source: Economic Survey of India 2017-18; PRS

मसौदा नीति राष्ट्रीय शोध प्रतिष्ठान की स्थापना का सुझाव देती है जोकि एक स्वायत्त निकाय होगा ताकि भारत में उच्च स्तरीय शोध के लिए फंडिंग, मेंटरिंग और क्षमता निर्माण किया जा सके। प्रतिष्ठान के चार प्रमुख प्रभाग होंगे: विज्ञान, तकनीक, सामाजिक विज्ञान और आर्ट्स एवं ह्यूमैनिटीज़। इसमें और प्रभाग जोड़े जा सकते हैं। प्रतिष्ठान को 20,000 करोड़ रुपए (जीडीपी का 0.1%) का वार्षिक अनुदान प्रदान किया जाएगा।
 

उदार दृष्टिकोण की ओर बढ़ना: मसौदा नीति सुझाव देती है कि अंडरग्रैजुएट प्रोग्राम्स को बहुअनुशासनिक (इंटरडिसिपलिनरी) बनाया जाए। इसके लिए इनके करिकुलम को दोबारा बनाना होगा ताकि निम्नलिखित को शामिल किया जा सके: (क) एक समान मुख्य करिकुलम और (ख) स्पेशलाइजेशन के एक/दो क्षेत्र। विद्यार्थियों को स्पेशलाइजेशन के लिए एक क्षेत्र को ‘मेजर’ और वैकल्पिक क्षेत्र को ‘माइनर’ के तौर पर चुनना होगा। लिबरल आर्ट्स में चार साल के अंडरग्रैजुएट प्रोग्रम्स शुरू किए जाएंगे और विद्यार्थियों को उचित सर्टिफिकेशन के साथ एक से अधिक निकास विकल्प (एक्जिट ऑप्शन्स) मुहैय्या कराए जाएंगे। इसके अतिरिक्त अगले पांच वर्षों में लिबरल आर्ट्स के पांच भारतीय संस्थानों को बहुअनुशासनिक लिबरल आर्ट्स के मॉडल संस्थानों के रूप में स्थापित किया जाना चाहिए।
 

फैकेल्टी का प्रोफेशनल विकास: कमिटी ने गौर किया कि उच्च शिक्षण संस्थानों में काम करने की खराब स्थितियां और शिक्षण के अत्यधिक दबाव से शिक्षकों का मनोबल गिरा है। इसके अतिरिक्त स्वायत्तता की कमी और करियर में प्रगति की व्यवस्थित प्रणाली न होने का भी असर हुआ है। मसौदा नीति सुझाव देती है कि सभी उच्च शिक्षण संस्थानों में 2030 तक फैकेल्टी के लिए निरंतर पेशेवर विकास कार्यक्रम विकसित किया जाए और स्थायी रोजगार (टैन्योर) ट्रैक प्रणाली की शुरुआत की जाए। इसके अतिरिक्त अधिकतम 30:1 के विद्यार्थी-शिक्षक अनुपात को सुनिश्चित किया जाए।
 

सीखने का श्रेष्ठ माहौल: कमिटी ने कहा कि करिकुलम गैर लचीला, संकुचित और पुराना है। हालांकि फैकेल्टी के पास अक्सर करिकुलम डिजाइन करने की स्वायत्तता नहीं होती जिसका शिक्षण के स्तर पर नकारात्मक असर होता है। कमिटी ने सुझाव दिया था कि सभी उच्च शिक्षण संस्थानों को करिकुलम, शिक्षण और संसाधन से संबंधित मामलों में पूरी स्वायत्तता मिलनी चाहिए।

शिक्षा में गवर्नेंस

कमिटी ने कहा कि शिक्षा में गवर्नेस की मौजूदा प्रणाली पर पुनर्विचार तथा विभिन्न मंत्रालयों, विभागों और संस्थाओं के बीच सिनर्जी एवं समन्वय कायम करने की जरूरत है। इस संबंध में कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए हैं:
 

प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में राष्ट्रीय शिक्षा आयोग की स्थापना जोकि शिक्षा का एपेक्स निकाय होगा। यह निकाय निरंतर और सतत आधार पर देश में शिक्षा के दृष्टिकोण को विकसित करने, उसे लागू करने, उसका मूल्यांकन करने और उस पर पुनर्विचार करने के लिए जिम्मेदार होगा। वह राष्ट्रीय शिक्षा अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी), प्रस्तावित राष्ट्रीय उच्च शिक्षा रेगुलेटरी अथॉरिटी तथा राष्ट्रीय शोध प्रतिष्ठान सहित अनेक निकायों के कामकाज और उनके कार्यान्वयन की निगरानी करेगा।
 

मानव संसाधन और विकास मंत्रालय को दोबारा शिक्षा मंत्रालय नाम दिया जाना चाहिए ताकि शिक्षा पर फिर से ध्यान केंद्रित किया जा सके।

शिक्षा का वित्त पोषण

मसौदा नीति ने शिक्षा में 6% सरकारी व्यय की प्रतिबद्धता को दोहराया। उल्लेखनीय है कि पहली राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 1968 ने शिक्षा में जीडीपी के 6% व्यय का सुझाव दिया था जिसे 1986 में दूसरे एनईपी ने दोहराया था। 2017-18 में भारत में शिक्षा पर सरकारी व्यय जीडीपी का 2.7% था।

तालिका 3: शिक्षा में कुल सार्वजनिक निवेश

देश

2017 में निवेश (जीडीपी के % के रूप में)

भारत

2.7

यूएसए

5

यूके

5.5

ब्राजील

6

शिक्षा पर कुल सार्वजनिक व्यय 10% है। मसौदा नीति इस दर को अगले 10 वर्षों में दोगुना करके 20% करने का प्रयास करती है। अतिरिक्त 10% में से 5% विश्वविद्यालयों और कॉलेजों (उच्च शिक्षा) पर खर्च किया जाएगा, 2% अतिरिक्त स्कूली शिक्षा में शिक्षकों की लागत या संसाधनों पर और 1.4% बच्चों की शुरुआती देखभाल और शिक्षा पर खर्च किया जाएगा।
 

कमिटी ने परिचालनगत समस्याओं और धनराशि के वितरण में लीकेज पर गौर किया। उदाहरण के लिए यह गौर किया गया कि जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थानों में लगभग 45% रिक्तियां हैं जिनके कारण उनके आबंटनों का इस्तेमाल नहीं किया गया या प्रभावी तरीके से इस्तेमाल नहीं हुआ। कमिटी ने संस्थागत विकास योजनाओं के जरिए धनराशि के अधिकतम और यथासमय उपयोग का सुझाव दिया।

शिक्षा में तकनीक

कमिटी ने गौर किया कि तकनीक निम्नलिखित में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है: (क) कक्षाओं में सीखने, सिखाने और मूल्यांकन की प्रक्रिया में सुधार करना, (ख) शिक्षकों को तैयार करने और उनके निरंतर पेशेवर विकास में सहायता देना, (ग) सुदूर क्षेत्रों तथा वंचित समूहों में शिक्षा तक पहुंच बढ़ाना, और (घ) समूची शिक्षा प्रणाली की योजना, प्रशासन और प्रबंधन में सुधार करना। कमिटी सभी शिक्षण संस्थानों के बिजलीकरण का सुझाव देती है, चूंकि बिजली तकनीक आधारित कार्यक्रमों की पूर्व शर्त है। इसके अतिरिक्त उसने निम्नलिखित का सुझाव दिया:
 

सूचना एवं संचार तकनीक के जरिए राष्ट्रीय शिक्षा अभियान: अभियान में वर्चुअल प्रयोगशालाएं शामिल हैं जिनके जरिए विभिन्न विषयों की प्रयोगशालाओं का दूर बैठे भी फायदा उठाया जा सकता है। इस अभियान के अंतर्गत राष्ट्रीय शिक्षा तकनीकी मंच का गठन भी किया जाएगा। यह एक स्वायत्त निकाय होगा और तकनीक को शुरू, स्थापित और प्रयोग करने से संबंधित फैसले लेने में मदद करेगा। यह मंच तकनीक आधारित कार्यक्रमों के संबंध में केंद्र और राज्य सरकारों को प्रमाण आधारित परामर्श देगा।
 

शिक्षा संबंधी आंकड़ों पर राष्ट्रीय रेपोजिटरी: राष्ट्रीय रेपोजिटरी की स्थापना की जाएगी। इसका मुख्य कार्य संस्थानों, शिक्षकों और विद्यार्थियों से संबंधित रिकॉर्ड्स का डिजिटल प्रारूप में रखरखाव करना होगा। इसके अतिरिक्त एक सिंगल ऑनलाइन डिजिटल रेपोजिटरी बनाई जाएगी जहां कॉपीराइट मुक्त शैक्षणिक संसाधन विभिन्न भाषाओं में उपलब्ध होंगे।

व्यावसायिक शिक्षा

कमिटी ने कहा कि 19-24 आयु वर्ग के 5% से भी कम श्रम बल को भारत में व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त होती है। इसके विपरीत यूएसए में 52%, जर्मनी में 75% और दक्षिण कोरिया में 96% युवाओं को व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त होती है। कमिटी ने सुझाव दिया कि 10 वर्षों की अवधि में चरणबद्ध तरीके से सभी शिक्षण संस्थानों (स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालयों) में व्यावसायिक शिक्षण कार्यक्रमों को एकीकृत किया जाना चाहिए। उल्लेखनीय है कि यह दक्षता विकास और उद्यमिता पर राष्ट्रीय नीति (2015) का अपवर्ड संशोधन है जिसका लक्ष्य 25% शिक्षण संस्थानों में व्यावसायिक शिक्षा प्रस्तावित करना था। इस संबंध में मुख्य सुझाव निम्न हैं:
 

व्यावसायिक पाठ्यक्रम: नौवीं से 12 वीं कक्षा के बीच के सभी स्कूली विद्यार्थियों को कम से कम एक व्यवसाय में व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त होनी चाहिए। प्रस्तावित स्कूल परिसरों की करिकुलम डिलिवरी विशेषज्ञता से लैस होनी चाहिए और यह मौजूदा नेशनल स्किल्स क्वालिफिकेशंस फ्रेमवर्क के दक्षता के स्तर के अनुकूल होनी चाहिए।
 

प्रस्तावित उच्च शिक्षण संस्थानों को ऐसे व्यावसायिक पाठ्यक्रम भी शुरू करने चाहिए जोकि अंडरग्रैजुएट शिक्षण कार्यक्रमों में एकीकृत हैं। मसौदा नीति का लक्ष्य यह है कि 2025 तक उच्च शिक्षण संस्थानों में दाखिला लेने वाले अधिकतम 50% विद्यार्थियों को व्यावसायिक शिक्षा उपलब्ध कराई जाए। इस समय इन संस्थानों के 10% से भी कम विद्यार्थियों को यह सुविधा उपलब्ध है।   
 

व्यावयासिक शिक्षा के एकीकरण के लिए राष्ट्रीय कमिटी: एक राष्ट्रीय कमिटी का गठन किया जाएगा ताकि इन लक्ष्यों को हासिल करने से संबंधित जरूरी कदमों पर कार्य किया जा सके। शिक्षण संस्थानों में व्यावसायिक शिक्षा के एकीकरण के लिए एक फंड की स्थापना की जाएगी। इस धनराशि के संवितरण का क्या तरीका होगा, कमिटी इस पर कार्य करेगी।

प्रौढ़ शिक्षा

जनगणना 2011 के अनुसार भारत में अब भी युवा निरक्षरों (15-24 वर्ष) की संख्या 3.26 करोड़ और वयस्क निरक्षरों (15 वर्ष और उससे अधिक) की संख्या 26.5 करोड़ है। इस संबंध में मसौदा नीति निम्नलिखित सुझाव देती है:
 

एनसीईआरटी के अंतर्गत एक घटक इकाई के रूप में केंद्रीय प्रौढ़ शिक्षा संस्थान की स्थापना की जाए। यह एक स्वायत्त संस्थान होगा जोकि प्रौढ़ शिक्षा के लिए राष्ट्रीय करिकुलम फ्रेमवर्क विकसित करेगा। इस फ्रेमवर्क में पांच व्यापक क्षेत्र शामिल होंगे: मूलभूत साक्षरता और संख्या ज्ञान, महत्वपूर्ण जीवन कौशल, व्यावसायिक दक्षता विकास, बुनियादी शिक्षा और सतत शिक्षा।
 

प्रौढ़ शिक्षा केद्रों को प्रस्तावित स्कूल परिसरों में शामिल किया जाएगा। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओपन स्कूलिंग में युवाओं और प्रौढ़ों के लिए संबंधित पाठ्यक्रमों को उपलब्ध कराया जाएगा। हाल ही प्रारंभ किए गए नेशनल ऑडिट ट्यूटर्स प्रोग्राम के जरिए प्रौढ़ शिक्षा के प्रशिक्षकों और प्रबंधकों का कैडर तथा वन-टू-वन ट्यूटर्स की टीम बनाई जाएगी।

 
राष्ट्रीय शिक्षा नीति का मसौदा तैयार करने के लिए मानव संसाधन मंत्रालय ने जून 2017 में एक कमिटी (डॉ. के. कस्तूरीरंगन) का गठन किया गया था। इस कमिटी ने 31 मई, 2019 को अपनी रिपोर्ट सौंपी। रिपोर्ट शिक्षा नीति को प्रस्तावित करती है। यह नीति मौजूदा शिक्षा प्रणाली की निम्नलिखित चुनौतियों को लक्षित करती है: (i) पहुंच, (ii) समानता, (iii) क्वालिटी, (iv) वहन करने योग्य, और (v) जवाबदेही।
 

मसौदा नीति स्कूल से लेकर उच्च शिक्षा के सभी स्तरों में सुधार का प्रावधान करती है। यह बचपन में प्रारंभिक देखभाल पर अधिक ध्यान देने, मौजूदा परीक्षा प्रणाली में सुधार करने, शिक्षकों के प्रशिक्षण को मजबूत करने तथा शिक्षा के रेगुलेटरी फ्रेमवर्क को दोबारा बनाने का प्रयास करती है। मसौदा नीति इस बात का भी प्रयास करती है कि राष्ट्रीय शिक्षा आयोग का गठन किया जाए, शिक्षा में सरकारी निवेश बढ़ाया जाए, तकनीक के प्रयोग को मजबूत किया जाए और व्यावसायिक एवं प्रौढ़ शिक्षा पर अधिक ध्यान दिया जाए, इत्यादि। मसौदा नीति के मुख्य निष्कर्षों और सुझावों में निम्न शामिल हैं:

स्कूली शिक्षा

बचपन में प्रारंभिक देखभाल और शिक्षा: शिक्षा तक पहुंच न होने के अतिरिक्त कमिटी ने यह गौर किया कि मौजूदा शिक्षण कार्यक्रमों में भी क्वालिटी संबंधी अनेक कमियां हैं। इनमें निम्नलिखित शामिल हैं: (i) ऐसे करिकुलम जो बच्चे की विकास संबंधी जरूरतों को पूरा नहीं करते, (ii) क्वालिफाइड और प्रशिक्षित शिक्षकों का अभाव, और (iii) शिक्षण का निम्न स्तर। वर्तमान में आंगनवाड़ियों और निजी प्री-स्कूलों के जरिए अधिकतर बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा प्रदान की जाती है। हालांकि प्रारंभिक देखभाल में शैक्षणिक पहलु पर कम ध्यान दिया जाता है। इसीलिए मसौदा नीति में प्रारंभिक देखभाल और शिक्षा के लिए दो स्तरीय करिकुलम विकसित करने का सुझाव दिया गया है। इसमें निम्नलिखित शामिल हैं: (i) तीन वर्ष तक के बच्चों के लिए दिशानिर्देश (ये दिशानिर्देश माता-पिता और शिक्षकों के लिए हैं), और (ii) तीन से आठ वर्ष के बच्चों के लिए शिक्षा संबंधी फ्रेमवर्क। इन्हें लागू करने के लिए आंगनवाड़ी प्रणाली में सुधार किया जाए और उन्हें व्यापक बनाया जाए, तथा आंगनवाड़ियों को प्राथमिक स्कूलों के परिसर में शिफ्ट किया जाए।
 

शिक्षा का अधिकार एक्ट, 2009 (आरटीई एक्ट) : वर्तमान में आरटीई एक्ट छह से 14 वर्ष तक के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान करता है। मसौदा नीति इस बात का सुझाव देती है कि आरटीई के दायरे को बढ़ाया जाए ताकि बचपन की प्रारंभिक शिक्षा और माध्यमिक स्कूली शिक्षा को इसमें शामिल किया जा सके। इससे एक्ट के दायरे में तीन से 18 वर्ष तक के बच्चे शामिल हो जाएंगे।
 

इसके अतिरिक्त कमिटी ने सुझाव दिया है कि आरटीई एक्ट में निरंतर और व्यापक मूल्यांकन तथा नो डिटेंशन पॉलिसी से संबंधित संशोधनों की समीक्षा की जाए। कमिटी ने कहा कि कक्षा आठ तक के बच्चों को फेल नहीं किया जाना चाहिए। इसके बजाय स्कूलों को सुनिश्चित करना चाहिए कि बच्चों को उनकी आयु के अनुकूल उचित स्तर की शिक्षा प्राप्त हो रही है।
 

करिकुलम का फ्रेमवर्क: बच्चों की विकास संबंधी जरूरतों को देखते हुए स्कूली शिक्षा की मौजूदा संरचना को एक बार फिर से बनाया जाना चाहिए। इसका डिजाइन 5-3-3-4 के आधार पर तैयार किया जाना चाहिए जिनमें निम्नलिखित शामिल हों: (i) पांच वर्ष का आधारभूत चरण (तीन वर्ष की प्री-प्राइमरी और कक्षा एक और दो), (ii) तैयारी के तीन वर्ष- कक्षा तीन से पांच), (iii) माध्यमिक चरण के तीन वर्ष (कक्षा छह से आठ), और (iv) माध्यमिक चरण के चार वर्ष (कक्षा नौ से 12)।
 

कमिटी ने कहा कि मौजूदा शिक्षा प्रणाली का पूरा ध्यान सिर्फ तथ्यों और प्रक्रियाओं के रटने पर केंद्रित है। इसलिए उसने सुझाव दिया कि प्रत्येक विषय में करिकुलम का भार कम किया जाए और जरूरी मुख्य कंटेंट पर ही ध्यान दिया जाए। इससे समग्र, चर्चा और चर्चा आधारित शिक्षा के लिए गुंजाइश बनेगी।
 

स्कूलों की परीक्षाओं में सुधार: कमिटी ने कहा कि मौजूदा बोर्ड परीक्षाओं के कारण: (i) बच्चे कुछ ही विषयों पर ध्यान केंद्रित करते हैं, (ii) शिक्षण की रचनात्मक तरीके से परीक्षा नहीं हो पाती, और (iii) विद्यार्थियों को तनाव होता है। स्कूल में बच्चे की प्रगति की निगरानी करने के लिए मसौदा नीति में कक्षा तीन, पांच और आठ में राज्य सेंसस परीक्षाओं का प्रस्ताव है। इसके अतिरिक्त कमिटी ने केवल मुख्य कॉन्सेप्ट्स, कौशल और उच्च श्रेणी की दक्षता की जांच के लिए बोर्ड परीक्षाओं के पुनर्गठन का सुझाव दिया है। इससे विद्यार्थी अनेक प्रकार के विषयों की परीक्षाएं दे पाएंगे। वे अपने विषय और सेमिस्टर चुनेंगे, ताकि वे तब परीक्षा दें, जब देना चाहें। ये परीक्षाएं स्कूलों की अपनी फाइनल परीक्षाओं का स्थान लेंगी।
 

स्कूल का इंफ्रास्ट्रक्चर: कमिटी ने कहा कि देश के हर इलाके में प्राथमिक स्कूल बनाने से शिक्षा तक लोगों की पहुंच बढ़ी है। हालांकि इससे बहुत छोटे स्कूल भी स्थापित किए गए हैं (जहां विद्यार्थियों की संख्या बहुत कम है)। स्कूल छोटे होने से उसे संचालित करना मुश्किल होता है। इसका असर शिक्षकों की तैनाती और भौतिक संसाधनों की उपलब्धता पर पड़ता है। इसलिए मसौदा नीति यह सुझाव देती है कि कई सरकारी स्कूलों को मिलाकर एक स्कूल परिसर बनाया जाए। एक परिसर में एक माध्यमिक स्कूल (कक्षा नौ से बारह) और आस-पड़ोस के ऐसे सभी सरकारी स्कूल आने चाहिए जोकि प्री-प्राइमरी से लेकर कक्षा आठ तक की शिक्षा प्रदान करते हैं।
 

स्कूल परिसरों में आंगनवाड़ियां, व्यावसायिक शिक्षा केंद्र और प्रौढ़ शिक्षा केंद्र भी शामिल होंगे। प्रत्येक स्कूल परिसर एक अर्ध स्वायत्त इकाई होगी, जिसमें बाल्यावस्था से लेकर माध्यमिक शिक्षा- यानी शिक्षा के सभी चरणों में एकीकृत शिक्षा प्रदान करेंगी। इससे यह सुनिश्चित होगा कि संसाधनों, जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर और प्रशिक्षित शिक्षकों को स्कूल परिसर में प्रभावी रूप से साझा किया जा सके।
 

शिक्षकों का प्रबंधन: कमिटी ने कहा कि शिक्षकों की संख्या कम है और पेशेवर तौर पर प्रशिक्षित शिक्षकों का भी अभाव है। साथ ही गैर शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए शिक्षकों की तैनाती की जाती है। मसौदा नीति में सुझाव दिया गया है कि एक शिक्षक को एक स्कूल परिसर में कम से कम पांच से सात वर्ष तक तैनात किया जाए। इसके अतिरिक्त शिक्षकों को स्कूली घंटों के दौरान गैर शैक्षणिक गतिविधियों में भाग लेने (जैसे मिड डे मील पकाने या टीकाकरण अभियानों में हिस्सा लेने) की अनुमति नहीं होगी जोकि उनकी शिक्षण क्षमताओं को प्रभावित कर सकती है।
 

शिक्षकों के शिक्षण के लिए मौजूदा बी.एड. प्रोग्राम को चार वर्ष के एकीकृत बी.एड. प्रोग्राम से रिप्लेस किया जाएगा जिसमें उच्च क्वालिटी का कंटेंट, शिक्षण का स्तर, और व्यावहरिक प्रशिक्षण शामिल होगा। सभी विषयों के लिए निरंतर एकीकृत पेशेवर विकास को भी विकसित किया जाएगा। शिक्षकों से हर वर्ष न्यूनतम 50 घंटे के निरंतर पेशेवर विकास प्रशिक्षण को पूरा करने की अपेक्षा की जाएगी।  
 

स्कूलों का रेगुलेशन: मसौदा नीति स्कूलों के रेगुलेशन को नीति निर्धारण, स्कूल के संचालन और शैक्षणिक विकास जैसे पहलुओं से अलग करने का सुझाव देती है। इसमें सुझाव दिया गया है कि प्रत्येक राज्य के लिए एक स्वतंत्र राज्य स्कूल रेगुलेटरी अथॉरिटी की स्थापना की जाए जो सरकारी और निजी स्कूलों के लिए बुनियादी यूनिफॉर्म स्टैंडर्ड्स को निर्धारित करेगी। राज्य के शिक्षा विभाग नीतियां बनाएंगे और निरीक्षण करेंगे।

उच्च शिक्षा

अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में उच्च शिक्षा में सकल दाखिला अनुपात (जीईआर) 2011-12 में 20.8% से बढ़कर 2017-18 में 25.8% हो गया।

तालिका 1: विभिन्न देशों में जीईआर के बीच तुलना (2014)

 

प्राथमिक (कक्षा 1-5)

उच्च प्राथमिक (कक्षा 6-8)

उच्च माध्यमिक (कक्षा 9-12)

उच्च शिक्षा

भारत

101.4

89.3

62.5

23

चीन

103.9

100.4

88.8

39.4

यूएसए

99.5

101.9

93.2

86.7

जर्मनी

103.3

101.6

104.6

65.5

Source: Educational Statistics at Glance (2016), MHRD; PRS.

कमिटी ने कहा कि देश में उच्च शिक्षा में निम्न दाखिले का मुख्य कारण यह है कि उस तक लोगों की पहुंच नहीं है। उसने जीईआर के 25.8% के मौजूदा स्तर को 2035 तक 50% करने का लक्ष्य निर्धारित किया। इस संबंध में मुख्य सुझावों में निम्नलिखित शामिल हैं:
 

रेगुलेटरी संरचना और एक्रेडेशन: कमिटी ने कहा कि मौजूदा उच्च शिक्षा प्रणाली में बहुत से रेगुलेटर हैं और उनके मैन्डेट्स ओवरलैप होते हैं। इससे उच्च शिक्षण संस्थानों की स्वायत्तता पर असर होता है और निर्भरता तथा केंद्रीकृत नीति निर्धारण का वातावरण तैयार होता है। इसलिए कमिटी ने राष्ट्रीय उच्च शिक्षा रेगुलेटरी अथॉरिटी (एनएचईआरए) की स्थापना का प्रस्ताव रखा। यह स्वतंत्र अथॉरिटी उच्च शिक्षा के रेगुलेटरों का स्थान लेगी जिसमें पेशेवर और व्यावासियक शिक्षा के रेगुलेटर भी शामिल हैं। इसका अर्थ यह है कि सभी पेशेवर परिषदों, जैसे एआईसीटीई और भारतीय बार काउंसिल की भूमिका केवल पेशेवर प्रैक्टिस के लिए मानदंड बनाने तक सीमित हो जाएगी। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) का काम भी केवल उच्च शिक्षण संस्थानों को अनुदान देने तक सीमित होगा।
 

वर्तमान में नेशनल एसेसमेंट एंड एक्रेडेशन काउंसिल (एनएएसी) एक एक्रेडेटड निकाय है जो यूजीसी के अंतर्गत आती है। मसौदा नीति ने एनएएसी को यूजीसी से अलग करके एक स्वतंत्र और स्वायत्त निकाय बनाने का सुझाव दिया है। इस भूमिका में एनएएसी टॉप लेवल की एक्रेडेटर के तौर पर काम करेगी और विभिन्न एक्रेडिटेशन संस्थानों को लाइसेंस जारी करेगी जोकि उच्च शिक्षण संस्थानों का हर पांच से सात वर्षों में एक बार मूल्यांकन करेगी। सभी मौजूदा शिक्षण संस्थानों का एक्रेडेशन 2030 तक हो जाना चाहिए।
 

नए उच्च शिक्षण संस्थानों की स्थापना: वर्तमान में उच्च शिक्षण संस्थान केवल संसद या राज्य कानूनों के जरिए स्थापित किए जा सकते हैं। मसौदा नीति प्रस्तावित करती है कि इन संस्थानों को एनएचईआरए से हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन चार्टर के जरिए स्थापित करने की अनुमति दी जा सकती है। इस चार्टर को कुछ विशिष्ट मानदंडों के पारदर्शी मूल्यांकन के आधार पर प्रदान किया जाएगा। सभी नए उच्च शिक्षण संस्थानों को स्थापना के पांच वर्षों के भीतर एनएचईआरए से एक्रेडेशन हासिल हो जाना चाहिए।
 

उच्च शिक्षण संस्थानों का पुनर्गठन: उच्च शिक्षण संस्थानों को तीन श्रेणियों में पुनर्गठित किया जाएगा: (i) शोध विश्वविद्यालय जोकि शोध और शिक्षण दोनों पर ध्यान केंद्रित करेंगे, (ii) शिक्षण विश्वविद्यालय जोकि शिक्षण पर मुख्य रूप से ध्यान केंद्रित करेंगे लेकिन महत्वपूर्ण शोध भी करेंगे, और (iii) कॉलेज, जोकि केवल अंडरग्रैजुएट शिक्षा देंगे। धीरे-धीरे इन सभी को पूर्ण शैक्षणिक, प्रशासनिक और वित्तीय स्वायत्तता दी जाएगी।
 

राष्ट्रीय शोध प्रतिष्ठान की स्थापना: कमिटी ने गौर किया कि भारत में शोध और नवाचार में कुल निवेश 2008 में 0.84% के मुकाबले गिरकर 2014 में 0.69% रह गया। भारत दूसरे देशों की तुलना में शोधार्थियों (प्रति लाख आबादी में), पेटेंट्स और पब्लिकेशंस के लिहाज से भी पिछड़ा हुआ है।

तालिका 2: शोध और नवाचार में निवेश

 

शोध और नवाचार में निवेश (जीडीपी का %)

शोधकर्ता (प्रति लाख जनसंख्या)

पेटेंट्स के कुल आवेदन

भारत

0.7

15

45,057

चीन

2.1

111

13,38,503

यूएसए

2.8

423

605,571

इज़राइल

4.3

825

6,419

Source: Economic Survey of India 2017-18; PRS

मसौदा नीति राष्ट्रीय शोध प्रतिष्ठान की स्थापना का सुझाव देती है जोकि एक स्वायत्त निकाय होगा ताकि भारत में उच्च स्तरीय शोध के लिए फंडिंग, मेंटरिंग और क्षमता निर्माण किया जा सके। प्रतिष्ठान के चार प्रमुख प्रभाग होंगे: विज्ञान, तकनीक, सामाजिक विज्ञान और आर्ट्स एवं ह्यूमैनिटीज़। इसमें और प्रभाग जोड़े जा सकते हैं। प्रतिष्ठान को 20,000 करोड़ रुपए (जीडीपी का 0.1%) का वार्षिक अनुदान प्रदान किया जाएगा।
 

उदार दृष्टिकोण की ओर बढ़ना: मसौदा नीति सुझाव देती है कि अंडरग्रैजुएट प्रोग्राम्स को बहुअनुशासनिक (इंटरडिसिपलिनरी) बनाया जाए। इसके लिए इनके करिकुलम को दोबारा बनाना होगा ताकि निम्नलिखित को शामिल किया जा सके: (क) एक समान मुख्य करिकुलम और (ख) स्पेशलाइजेशन के एक/दो क्षेत्र। विद्यार्थियों को स्पेशलाइजेशन के लिए एक क्षेत्र को ‘मेजर’ और वैकल्पिक क्षेत्र को ‘माइनर’ के तौर पर चुनना होगा। लिबरल आर्ट्स में चार साल के अंडरग्रैजुएट प्रोग्रम्स शुरू किए जाएंगे और विद्यार्थियों को उचित सर्टिफिकेशन के साथ एक से अधिक निकास विकल्प (एक्जिट ऑप्शन्स) मुहैय्या कराए जाएंगे। इसके अतिरिक्त अगले पांच वर्षों में लिबरल आर्ट्स के पांच भारतीय संस्थानों को बहुअनुशासनिक लिबरल आर्ट्स के मॉडल संस्थानों के रूप में स्थापित किया जाना चाहिए।
 

फैकेल्टी का प्रोफेशनल विकास: कमिटी ने गौर किया कि उच्च शिक्षण संस्थानों में काम करने की खराब स्थितियां और शिक्षण के अत्यधिक दबाव से शिक्षकों का मनोबल गिरा है। इसके अतिरिक्त स्वायत्तता की कमी और करियर में प्रगति की व्यवस्थित प्रणाली न होने का भी असर हुआ है। मसौदा नीति सुझाव देती है कि सभी उच्च शिक्षण संस्थानों में 2030 तक फैकेल्टी के लिए निरंतर पेशेवर विकास कार्यक्रम विकसित किया जाए और स्थायी रोजगार (टैन्योर) ट्रैक प्रणाली की शुरुआत की जाए। इसके अतिरिक्त अधिकतम 30:1 के विद्यार्थी-शिक्षक अनुपात को सुनिश्चित किया जाए।
 

सीखने का श्रेष्ठ माहौल: कमिटी ने कहा कि करिकुलम गैर लचीला, संकुचित और पुराना है। हालांकि फैकेल्टी के पास अक्सर करिकुलम डिजाइन करने की स्वायत्तता नहीं होती जिसका शिक्षण के स्तर पर नकारात्मक असर होता है। कमिटी ने सुझाव दिया था कि सभी उच्च शिक्षण संस्थानों को करिकुलम, शिक्षण और संसाधन से संबंधित मामलों में पूरी स्वायत्तता मिलनी चाहिए।

शिक्षा में गवर्नेंस

कमिटी ने कहा कि शिक्षा में गवर्नेस की मौजूदा प्रणाली पर पुनर्विचार तथा विभिन्न मंत्रालयों, विभागों और संस्थाओं के बीच सिनर्जी एवं समन्वय कायम करने की जरूरत है। इस संबंध में कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए हैं:
 

प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में राष्ट्रीय शिक्षा आयोग की स्थापना जोकि शिक्षा का एपेक्स निकाय होगा। यह निकाय निरंतर और सतत आधार पर देश में शिक्षा के दृष्टिकोण को विकसित करने, उसे लागू करने, उसका मूल्यांकन करने और उस पर पुनर्विचार करने के लिए जिम्मेदार होगा। वह राष्ट्रीय शिक्षा अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी), प्रस्तावित राष्ट्रीय उच्च शिक्षा रेगुलेटरी अथॉरिटी तथा राष्ट्रीय शोध प्रतिष्ठान सहित अनेक निकायों के कामकाज और उनके कार्यान्वयन की निगरानी करेगा।
 

मानव संसाधन और विकास मंत्रालय को दोबारा शिक्षा मंत्रालय नाम दिया जाना चाहिए ताकि शिक्षा पर फिर से ध्यान केंद्रित किया जा सके।

शिक्षा का वित्त पोषण

मसौदा नीति ने शिक्षा में 6% सरकारी व्यय की प्रतिबद्धता को दोहराया। उल्लेखनीय है कि पहली राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 1968 ने शिक्षा में जीडीपी के 6% व्यय का सुझाव दिया था जिसे 1986 में दूसरे एनईपी ने दोहराया था। 2017-18 में भारत में शिक्षा पर सरकारी व्यय जीडीपी का 2.7% था।

तालिका 3: शिक्षा में कुल सार्वजनिक निवेश

देश

2017 में निवेश (जीडीपी के % के रूप में)

भारत

2.7

यूएसए

5

यूके

5.5

ब्राजील

6

शिक्षा पर कुल सार्वजनिक व्यय 10% है। मसौदा नीति इस दर को अगले 10 वर्षों में दोगुना करके 20% करने का प्रयास करती है। अतिरिक्त 10% में से 5% विश्वविद्यालयों और कॉलेजों (उच्च शिक्षा) पर खर्च किया जाएगा, 2% अतिरिक्त स्कूली शिक्षा में शिक्षकों की लागत या संसाधनों पर और 1.4% बच्चों की शुरुआती देखभाल और शिक्षा पर खर्च किया जाएगा।
 

कमिटी ने परिचालनगत समस्याओं और धनराशि के वितरण में लीकेज पर गौर किया। उदाहरण के लिए यह गौर किया गया कि जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थानों में लगभग 45% रिक्तियां हैं जिनके कारण उनके आबंटनों का इस्तेमाल नहीं किया गया या प्रभावी तरीके से इस्तेमाल नहीं हुआ। कमिटी ने संस्थागत विकास योजनाओं के जरिए धनराशि के अधिकतम और यथासमय उपयोग का सुझाव दिया।

शिक्षा में तकनीक

कमिटी ने गौर किया कि तकनीक निम्नलिखित में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है: (क) कक्षाओं में सीखने, सिखाने और मूल्यांकन की प्रक्रिया में सुधार करना, (ख) शिक्षकों को तैयार करने और उनके निरंतर पेशेवर विकास में सहायता देना, (ग) सुदूर क्षेत्रों तथा वंचित समूहों में शिक्षा तक पहुंच बढ़ाना, और (घ) समूची शिक्षा प्रणाली की योजना, प्रशासन और प्रबंधन में सुधार करना। कमिटी सभी शिक्षण संस्थानों के बिजलीकरण का सुझाव देती है, चूंकि बिजली तकनीक आधारित कार्यक्रमों की पूर्व शर्त है। इसके अतिरिक्त उसने निम्नलिखित का सुझाव दिया:
 

सूचना एवं संचार तकनीक के जरिए राष्ट्रीय शिक्षा अभियान: अभियान में वर्चुअल प्रयोगशालाएं शामिल हैं जिनके जरिए विभिन्न विषयों की प्रयोगशालाओं का दूर बैठे भी फायदा उठाया जा सकता है। इस अभियान के अंतर्गत राष्ट्रीय शिक्षा तकनीकी मंच का गठन भी किया जाएगा। यह एक स्वायत्त निकाय होगा और तकनीक को शुरू, स्थापित और प्रयोग करने से संबंधित फैसले लेने में मदद करेगा। यह मंच तकनीक आधारित कार्यक्रमों के संबंध में केंद्र और राज्य सरकारों को प्रमाण आधारित परामर्श देगा।
 

शिक्षा संबंधी आंकड़ों पर राष्ट्रीय रेपोजिटरी: राष्ट्रीय रेपोजिटरी की स्थापना की जाएगी। इसका मुख्य कार्य संस्थानों, शिक्षकों और विद्यार्थियों से संबंधित रिकॉर्ड्स का डिजिटल प्रारूप में रखरखाव करना होगा। इसके अतिरिक्त एक सिंगल ऑनलाइन डिजिटल रेपोजिटरी बनाई जाएगी जहां कॉपीराइट मुक्त शैक्षणिक संसाधन विभिन्न भाषाओं में उपलब्ध होंगे।

व्यावसायिक शिक्षा

कमिटी ने कहा कि 19-24 आयु वर्ग के 5% से भी कम श्रम बल को भारत में व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त होती है। इसके विपरीत यूएसए में 52%, जर्मनी में 75% और दक्षिण कोरिया में 96% युवाओं को व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त होती है। कमिटी ने सुझाव दिया कि 10 वर्षों की अवधि में चरणबद्ध तरीके से सभी शिक्षण संस्थानों (स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालयों) में व्यावसायिक शिक्षण कार्यक्रमों को एकीकृत किया जाना चाहिए। उल्लेखनीय है कि यह दक्षता विकास और उद्यमिता पर राष्ट्रीय नीति (2015) का अपवर्ड संशोधन है जिसका लक्ष्य 25% शिक्षण संस्थानों में व्यावसायिक शिक्षा प्रस्तावित करना था। इस संबंध में मुख्य सुझाव निम्न हैं:
 

व्यावसायिक पाठ्यक्रम: नौवीं से 12 वीं कक्षा के बीच के सभी स्कूली विद्यार्थियों को कम से कम एक व्यवसाय में व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त होनी चाहिए। प्रस्तावित स्कूल परिसरों की करिकुलम डिलिवरी विशेषज्ञता से लैस होनी चाहिए और यह मौजूदा नेशनल स्किल्स क्वालिफिकेशंस फ्रेमवर्क के दक्षता के स्तर के अनुकूल होनी चाहिए।
 

प्रस्तावित उच्च शिक्षण संस्थानों को ऐसे व्यावसायिक पाठ्यक्रम भी शुरू करने चाहिए जोकि अंडरग्रैजुएट शिक्षण कार्यक्रमों में एकीकृत हैं। मसौदा नीति का लक्ष्य यह है कि 2025 तक उच्च शिक्षण संस्थानों में दाखिला लेने वाले अधिकतम 50% विद्यार्थियों को व्यावसायिक शिक्षा उपलब्ध कराई जाए। इस समय इन संस्थानों के 10% से भी कम विद्यार्थियों को यह सुविधा उपलब्ध है।   
 

व्यावयासिक शिक्षा के एकीकरण के लिए राष्ट्रीय कमिटी: एक राष्ट्रीय कमिटी का गठन किया जाएगा ताकि इन लक्ष्यों को हासिल करने से संबंधित जरूरी कदमों पर कार्य किया जा सके। शिक्षण संस्थानों में व्यावसायिक शिक्षा के एकीकरण के लिए एक फंड की स्थापना की जाएगी। इस धनराशि के संवितरण का क्या तरीका होगा, कमिटी इस पर कार्य करेगी।

प्रौढ़ शिक्षा

जनगणना 2011 के अनुसार भारत में अब भी युवा निरक्षरों (15-24 वर्ष) की संख्या 3.26 करोड़ और वयस्क निरक्षरों (15 वर्ष और उससे अधिक) की संख्या 26.5 करोड़ है। इस संबंध में मसौदा नीति निम्नलिखित सुझाव देती है:
 

एनसीईआरटी के अंतर्गत एक घटक इकाई के रूप में केंद्रीय प्रौढ़ शिक्षा संस्थान की स्थापना की जाए। यह एक स्वायत्त संस्थान होगा जोकि प्रौढ़ शिक्षा के लिए राष्ट्रीय करिकुलम फ्रेमवर्क विकसित करेगा। इस फ्रेमवर्क में पांच व्यापक क्षेत्र शामिल होंगे: मूलभूत साक्षरता और संख्या ज्ञान, महत्वपूर्ण जीवन कौशल, व्यावसायिक दक्षता विकास, बुनियादी शिक्षा और सतत शिक्षा।
 

प्रौढ़ शिक्षा केद्रों को प्रस्तावित स्कूल परिसरों में शामिल किया जाएगा। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओपन स्कूलिंग में युवाओं और प्रौढ़ों के लिए संबंधित पाठ्यक्रमों को उपलब्ध कराया जाएगा। हाल ही प्रारंभ किए गए नेशनल ऑडिट ट्यूटर्स प्रोग्राम के जरिए प्रौढ़ शिक्षा के प्रशिक्षकों और प्रबंधकों का कैडर तथा वन-टू-वन ट्यूटर्स की टीम बनाई जाएगी।

 
राष्ट्रीय शिक्षा नीति का मसौदा तैयार करने के लिए मानव संसाधन मंत्रालय ने जून 2017 में एक कमिटी (डॉ. के. कस्तूरीरंगन) का गठन किया गया था। इस कमिटी ने 31 मई, 2019 को अपनी रिपोर्ट सौंपी। रिपोर्ट शिक्षा नीति को प्रस्तावित करती है। यह नीति मौजूदा शिक्षा प्रणाली की निम्नलिखित चुनौतियों को लक्षित करती है: (i) पहुंच, (ii) समानता, (iii) क्वालिटी, (iv) वहन करने योग्य, और (v) जवाबदेही।
 

मसौदा नीति स्कूल से लेकर उच्च शिक्षा के सभी स्तरों में सुधार का प्रावधान करती है। यह बचपन में प्रारंभिक देखभाल पर अधिक ध्यान देने, मौजूदा परीक्षा प्रणाली में सुधार करने, शिक्षकों के प्रशिक्षण को मजबूत करने तथा शिक्षा के रेगुलेटरी फ्रेमवर्क को दोबारा बनाने का प्रयास करती है। मसौदा नीति इस बात का भी प्रयास करती है कि राष्ट्रीय शिक्षा आयोग का गठन किया जाए, शिक्षा में सरकारी निवेश बढ़ाया जाए, तकनीक के प्रयोग को मजबूत किया जाए और व्यावसायिक एवं प्रौढ़ शिक्षा पर अधिक ध्यान दिया जाए, इत्यादि। मसौदा नीति के मुख्य निष्कर्षों और सुझावों में निम्न शामिल हैं:

स्कूली शिक्षा

बचपन में प्रारंभिक देखभाल और शिक्षा: शिक्षा तक पहुंच न होने के अतिरिक्त कमिटी ने यह गौर किया कि मौजूदा शिक्षण कार्यक्रमों में भी क्वालिटी संबंधी अनेक कमियां हैं। इनमें निम्नलिखित शामिल हैं: (i) ऐसे करिकुलम जो बच्चे की विकास संबंधी जरूरतों को पूरा नहीं करते, (ii) क्वालिफाइड और प्रशिक्षित शिक्षकों का अभाव, और (iii) शिक्षण का निम्न स्तर। वर्तमान में आंगनवाड़ियों और निजी प्री-स्कूलों के जरिए अधिकतर बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा प्रदान की जाती है। हालांकि प्रारंभिक देखभाल में शैक्षणिक पहलु पर कम ध्यान दिया जाता है। इसीलिए मसौदा नीति में प्रारंभिक देखभाल और शिक्षा के लिए दो स्तरीय करिकुलम विकसित करने का सुझाव दिया गया है। इसमें निम्नलिखित शामिल हैं: (i) तीन वर्ष तक के बच्चों के लिए दिशानिर्देश (ये दिशानिर्देश माता-पिता और शिक्षकों के लिए हैं), और (ii) तीन से आठ वर्ष के बच्चों के लिए शिक्षा संबंधी फ्रेमवर्क। इन्हें लागू करने के लिए आंगनवाड़ी प्रणाली में सुधार किया जाए और उन्हें व्यापक बनाया जाए, तथा आंगनवाड़ियों को प्राथमिक स्कूलों के परिसर में शिफ्ट किया जाए।
 

शिक्षा का अधिकार एक्ट, 2009 (आरटीई एक्ट) : वर्तमान में आरटीई एक्ट छह से 14 वर्ष तक के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान करता है। मसौदा नीति इस बात का सुझाव देती है कि आरटीई के दायरे को बढ़ाया जाए ताकि बचपन की प्रारंभिक शिक्षा और माध्यमिक स्कूली शिक्षा को इसमें शामिल किया जा सके। इससे एक्ट के दायरे में तीन से 18 वर्ष तक के बच्चे शामिल हो जाएंगे।
 

इसके अतिरिक्त कमिटी ने सुझाव दिया है कि आरटीई एक्ट में निरंतर और व्यापक मूल्यांकन तथा नो डिटेंशन पॉलिसी से संबंधित संशोधनों की समीक्षा की जाए। कमिटी ने कहा कि कक्षा आठ तक के बच्चों को फेल नहीं किया जाना चाहिए। इसके बजाय स्कूलों को सुनिश्चित करना चाहिए कि बच्चों को उनकी आयु के अनुकूल उचित स्तर की शिक्षा प्राप्त हो रही है।
 

करिकुलम का फ्रेमवर्क: बच्चों की विकास संबंधी जरूरतों को देखते हुए स्कूली शिक्षा की मौजूदा संरचना को एक बार फिर से बनाया जाना चाहिए। इसका डिजाइन 5-3-3-4 के आधार पर तैयार किया जाना चाहिए जिनमें निम्नलिखित शामिल हों: (i) पांच वर्ष का आधारभूत चरण (तीन वर्ष की प्री-प्राइमरी और कक्षा एक और दो), (ii) तैयारी के तीन वर्ष- कक्षा तीन से पांच), (iii) माध्यमिक चरण के तीन वर्ष (कक्षा छह से आठ), और (iv) माध्यमिक चरण के चार वर्ष (कक्षा नौ से 12)।
 

कमिटी ने कहा कि मौजूदा शिक्षा प्रणाली का पूरा ध्यान सिर्फ तथ्यों और प्रक्रियाओं के रटने पर केंद्रित है। इसलिए उसने सुझाव दिया कि प्रत्येक विषय में करिकुलम का भार कम किया जाए और जरूरी मुख्य कंटेंट पर ही ध्यान दिया जाए। इससे समग्र, चर्चा और चर्चा आधारित शिक्षा के लिए गुंजाइश बनेगी।
 

स्कूलों की परीक्षाओं में सुधार: कमिटी ने कहा कि मौजूदा बोर्ड परीक्षाओं के कारण: (i) बच्चे कुछ ही विषयों पर ध्यान केंद्रित करते हैं, (ii) शिक्षण की रचनात्मक तरीके से परीक्षा नहीं हो पाती, और (iii) विद्यार्थियों को तनाव होता है। स्कूल में बच्चे की प्रगति की निगरानी करने के लिए मसौदा नीति में कक्षा तीन, पांच और आठ में राज्य सेंसस परीक्षाओं का प्रस्ताव है। इसके अतिरिक्त कमिटी ने केवल मुख्य कॉन्सेप्ट्स, कौशल और उच्च श्रेणी की दक्षता की जांच के लिए बोर्ड परीक्षाओं के पुनर्गठन का सुझाव दिया है। इससे विद्यार्थी अनेक प्रकार के विषयों की परीक्षाएं दे पाएंगे। वे अपने विषय और सेमिस्टर चुनेंगे, ताकि वे तब परीक्षा दें, जब देना चाहें। ये परीक्षाएं स्कूलों की अपनी फाइनल परीक्षाओं का स्थान लेंगी।
 

स्कूल का इंफ्रास्ट्रक्चर: कमिटी ने कहा कि देश के हर इलाके में प्राथमिक स्कूल बनाने से शिक्षा तक लोगों की पहुंच बढ़ी है। हालांकि इससे बहुत छोटे स्कूल भी स्थापित किए गए हैं (जहां विद्यार्थियों की संख्या बहुत कम है)। स्कूल छोटे होने से उसे संचालित करना मुश्किल होता है। इसका असर शिक्षकों की तैनाती और भौतिक संसाधनों की उपलब्धता पर पड़ता है। इसलिए मसौदा नीति यह सुझाव देती है कि कई सरकारी स्कूलों को मिलाकर एक स्कूल परिसर बनाया जाए। एक परिसर में एक माध्यमिक स्कूल (कक्षा नौ से बारह) और आस-पड़ोस के ऐसे सभी सरकारी स्कूल आने चाहिए जोकि प्री-प्राइमरी से लेकर कक्षा आठ तक की शिक्षा प्रदान करते हैं।
 

स्कूल परिसरों में आंगनवाड़ियां, व्यावसायिक शिक्षा केंद्र और प्रौढ़ शिक्षा केंद्र भी शामिल होंगे। प्रत्येक स्कूल परिसर एक अर्ध स्वायत्त इकाई होगी, जिसमें बाल्यावस्था से लेकर माध्यमिक शिक्षा- यानी शिक्षा के सभी चरणों में एकीकृत शिक्षा प्रदान करेंगी। इससे यह सुनिश्चित होगा कि संसाधनों, जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर और प्रशिक्षित शिक्षकों को स्कूल परिसर में प्रभावी रूप से साझा किया जा सके।
 

शिक्षकों का प्रबंधन: कमिटी ने कहा कि शिक्षकों की संख्या कम है और पेशेवर तौर पर प्रशिक्षित शिक्षकों का भी अभाव है। साथ ही गैर शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए शिक्षकों की तैनाती की जाती है। मसौदा नीति में सुझाव दिया गया है कि एक शिक्षक को एक स्कूल परिसर में कम से कम पांच से सात वर्ष तक तैनात किया जाए। इसके अतिरिक्त शिक्षकों को स्कूली घंटों के दौरान गैर शैक्षणिक गतिविधियों में भाग लेने (जैसे मिड डे मील पकाने या टीकाकरण अभियानों में हिस्सा लेने) की अनुमति नहीं होगी जोकि उनकी शिक्षण क्षमताओं को प्रभावित कर सकती है।
 

शिक्षकों के शिक्षण के लिए मौजूदा बी.एड. प्रोग्राम को चार वर्ष के एकीकृत बी.एड. प्रोग्राम से रिप्लेस किया जाएगा जिसमें उच्च क्वालिटी का कंटेंट, शिक्षण का स्तर, और व्यावहरिक प्रशिक्षण शामिल होगा। सभी विषयों के लिए निरंतर एकीकृत पेशेवर विकास को भी विकसित किया जाएगा। शिक्षकों से हर वर्ष न्यूनतम 50 घंटे के निरंतर पेशेवर विकास प्रशिक्षण को पूरा करने की अपेक्षा की जाएगी।  
 

स्कूलों का रेगुलेशन: मसौदा नीति स्कूलों के रेगुलेशन को नीति निर्धारण, स्कूल के संचालन और शैक्षणिक विकास जैसे पहलुओं से अलग करने का सुझाव देती है। इसमें सुझाव दिया गया है कि प्रत्येक राज्य के लिए एक स्वतंत्र राज्य स्कूल रेगुलेटरी अथॉरिटी की स्थापना की जाए जो सरकारी और निजी स्कूलों के लिए बुनियादी यूनिफॉर्म स्टैंडर्ड्स को निर्धारित करेगी। राज्य के शिक्षा विभाग नीतियां बनाएंगे और निरीक्षण करेंगे।

उच्च शिक्षा

अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में उच्च शिक्षा में सकल दाखिला अनुपात (जीईआर) 2011-12 में 20.8% से बढ़कर 2017-18 में 25.8% हो गया।

तालिका 1: विभिन्न देशों में जीईआर के बीच तुलना (2014)

 

प्राथमिक (कक्षा 1-5)

उच्च प्राथमिक (कक्षा 6-8)

उच्च माध्यमिक (कक्षा 9-12)

उच्च शिक्षा

भारत

101.4

89.3

62.5

23

चीन

103.9

100.4

88.8

39.4

यूएसए

99.5

101.9

93.2

86.7

जर्मनी

103.3

101.6

104.6

65.5

Source: Educational Statistics at Glance (2016), MHRD; PRS.

कमिटी ने कहा कि देश में उच्च शिक्षा में निम्न दाखिले का मुख्य कारण यह है कि उस तक लोगों की पहुंच नहीं है। उसने जीईआर के 25.8% के मौजूदा स्तर को 2035 तक 50% करने का लक्ष्य निर्धारित किया। इस संबंध में मुख्य सुझावों में निम्नलिखित शामिल हैं:
 

रेगुलेटरी संरचना और एक्रेडेशन: कमिटी ने कहा कि मौजूदा उच्च शिक्षा प्रणाली में बहुत से रेगुलेटर हैं और उनके मैन्डेट्स ओवरलैप होते हैं। इससे उच्च शिक्षण संस्थानों की स्वायत्तता पर असर होता है और निर्भरता तथा केंद्रीकृत नीति निर्धारण का वातावरण तैयार होता है। इसलिए कमिटी ने राष्ट्रीय उच्च शिक्षा रेगुलेटरी अथॉरिटी (एनएचईआरए) की स्थापना का प्रस्ताव रखा। यह स्वतंत्र अथॉरिटी उच्च शिक्षा के रेगुलेटरों का स्थान लेगी जिसमें पेशेवर और व्यावासियक शिक्षा के रेगुलेटर भी शामिल हैं। इसका अर्थ यह है कि सभी पेशेवर परिषदों, जैसे एआईसीटीई और भारतीय बार काउंसिल की भूमिका केवल पेशेवर प्रैक्टिस के लिए मानदंड बनाने तक सीमित हो जाएगी। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) का काम भी केवल उच्च शिक्षण संस्थानों को अनुदान देने तक सीमित होगा।
 

वर्तमान में नेशनल एसेसमेंट एंड एक्रेडेशन काउंसिल (एनएएसी) एक एक्रेडेटड निकाय है जो यूजीसी के अंतर्गत आती है। मसौदा नीति ने एनएएसी को यूजीसी से अलग करके एक स्वतंत्र और स्वायत्त निकाय बनाने का सुझाव दिया है। इस भूमिका में एनएएसी टॉप लेवल की एक्रेडेटर के तौर पर काम करेगी और विभिन्न एक्रेडिटेशन संस्थानों को लाइसेंस जारी करेगी जोकि उच्च शिक्षण संस्थानों का हर पांच से सात वर्षों में एक बार मूल्यांकन करेगी। सभी मौजूदा शिक्षण संस्थानों का एक्रेडेशन 2030 तक हो जाना चाहिए।
 

नए उच्च शिक्षण संस्थानों की स्थापना: वर्तमान में उच्च शिक्षण संस्थान केवल संसद या राज्य कानूनों के जरिए स्थापित किए जा सकते हैं। मसौदा नीति प्रस्तावित करती है कि इन संस्थानों को एनएचईआरए से हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन चार्टर के जरिए स्थापित करने की अनुमति दी जा सकती है। इस चार्टर को कुछ विशिष्ट मानदंडों के पारदर्शी मूल्यांकन के आधार पर प्रदान किया जाएगा। सभी नए उच्च शिक्षण संस्थानों को स्थापना के पांच वर्षों के भीतर एनएचईआरए से एक्रेडेशन हासिल हो जाना चाहिए।
 

उच्च शिक्षण संस्थानों का पुनर्गठन: उच्च शिक्षण संस्थानों को तीन श्रेणियों में पुनर्गठित किया जाएगा: (i) शोध विश्वविद्यालय जोकि शोध और शिक्षण दोनों पर ध्यान केंद्रित करेंगे, (ii) शिक्षण विश्वविद्यालय जोकि शिक्षण पर मुख्य रूप से ध्यान केंद्रित करेंगे लेकिन महत्वपूर्ण शोध भी करेंगे, और (iii) कॉलेज, जोकि केवल अंडरग्रैजुएट शिक्षा देंगे। धीरे-धीरे इन सभी को पूर्ण शैक्षणिक, प्रशासनिक और वित्तीय स्वायत्तता दी जाएगी।
 

राष्ट्रीय शोध प्रतिष्ठान की स्थापना: कमिटी ने गौर किया कि भारत में शोध और नवाचार में कुल निवेश 2008 में 0.84% के मुकाबले गिरकर 2014 में 0.69% रह गया। भारत दूसरे देशों की तुलना में शोधार्थियों (प्रति लाख आबादी में), पेटेंट्स और पब्लिकेशंस के लिहाज से भी पिछड़ा हुआ है।

तालिका 2: शोध और नवाचार में निवेश

 

शोध और नवाचार में निवेश (जीडीपी का %)

शोधकर्ता (प्रति लाख जनसंख्या)

पेटेंट्स के कुल आवेदन

भारत

0.7

15

45,057

चीन

2.1

111

13,38,503

यूएसए

2.8

423

605,571

इज़राइल

4.3

825

6,419

Source: Economic Survey of India 2017-18; PRS

मसौदा नीति राष्ट्रीय शोध प्रतिष्ठान की स्थापना का सुझाव देती है जोकि एक स्वायत्त निकाय होगा ताकि भारत में उच्च स्तरीय शोध के लिए फंडिंग, मेंटरिंग और क्षमता निर्माण किया जा सके। प्रतिष्ठान के चार प्रमुख प्रभाग होंगे: विज्ञान, तकनीक, सामाजिक विज्ञान और आर्ट्स एवं ह्यूमैनिटीज़। इसमें और प्रभाग जोड़े जा सकते हैं। प्रतिष्ठान को 20,000 करोड़ रुपए (जीडीपी का 0.1%) का वार्षिक अनुदान प्रदान किया जाएगा।
 

उदार दृष्टिकोण की ओर बढ़ना: मसौदा नीति सुझाव देती है कि अंडरग्रैजुएट प्रोग्राम्स को बहुअनुशासनिक (इंटरडिसिपलिनरी) बनाया जाए। इसके लिए इनके करिकुलम को दोबारा बनाना होगा ताकि निम्नलिखित को शामिल किया जा सके: (क) एक समान मुख्य करिकुलम और (ख) स्पेशलाइजेशन के एक/दो क्षेत्र। विद्यार्थियों को स्पेशलाइजेशन के लिए एक क्षेत्र को ‘मेजर’ और वैकल्पिक क्षेत्र को ‘माइनर’ के तौर पर चुनना होगा। लिबरल आर्ट्स में चार साल के अंडरग्रैजुएट प्रोग्रम्स शुरू किए जाएंगे और विद्यार्थियों को उचित सर्टिफिकेशन के साथ एक से अधिक निकास विकल्प (एक्जिट ऑप्शन्स) मुहैय्या कराए जाएंगे। इसके अतिरिक्त अगले पांच वर्षों में लिबरल आर्ट्स के पांच भारतीय संस्थानों को बहुअनुशासनिक लिबरल आर्ट्स के मॉडल संस्थानों के रूप में स्थापित किया जाना चाहिए।
 

फैकेल्टी का प्रोफेशनल विकास: कमिटी ने गौर किया कि उच्च शिक्षण संस्थानों में काम करने की खराब स्थितियां और शिक्षण के अत्यधिक दबाव से शिक्षकों का मनोबल गिरा है। इसके अतिरिक्त स्वायत्तता की कमी और करियर में प्रगति की व्यवस्थित प्रणाली न होने का भी असर हुआ है। मसौदा नीति सुझाव देती है कि सभी उच्च शिक्षण संस्थानों में 2030 तक फैकेल्टी के लिए निरंतर पेशेवर विकास कार्यक्रम विकसित किया जाए और स्थायी रोजगार (टैन्योर) ट्रैक प्रणाली की शुरुआत की जाए। इसके अतिरिक्त अधिकतम 30:1 के विद्यार्थी-शिक्षक अनुपात को सुनिश्चित किया जाए।
 

सीखने का श्रेष्ठ माहौल: कमिटी ने कहा कि करिकुलम गैर लचीला, संकुचित और पुराना है। हालांकि फैकेल्टी के पास अक्सर करिकुलम डिजाइन करने की स्वायत्तता नहीं होती जिसका शिक्षण के स्तर पर नकारात्मक असर होता है। कमिटी ने सुझाव दिया था कि सभी उच्च शिक्षण संस्थानों को करिकुलम, शिक्षण और संसाधन से संबंधित मामलों में पूरी स्वायत्तता मिलनी चाहिए।

शिक्षा में गवर्नेंस

कमिटी ने कहा कि शिक्षा में गवर्नेस की मौजूदा प्रणाली पर पुनर्विचार तथा विभिन्न मंत्रालयों, विभागों और संस्थाओं के बीच सिनर्जी एवं समन्वय कायम करने की जरूरत है। इस संबंध में कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए हैं:
 

प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में राष्ट्रीय शिक्षा आयोग की स्थापना जोकि शिक्षा का एपेक्स निकाय होगा। यह निकाय निरंतर और सतत आधार पर देश में शिक्षा के दृष्टिकोण को विकसित करने, उसे लागू करने, उसका मूल्यांकन करने और उस पर पुनर्विचार करने के लिए जिम्मेदार होगा। वह राष्ट्रीय शिक्षा अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी), प्रस्तावित राष्ट्रीय उच्च शिक्षा रेगुलेटरी अथॉरिटी तथा राष्ट्रीय शोध प्रतिष्ठान सहित अनेक निकायों के कामकाज और उनके कार्यान्वयन की निगरानी करेगा।
 

मानव संसाधन और विकास मंत्रालय को दोबारा शिक्षा मंत्रालय नाम दिया जाना चाहिए ताकि शिक्षा पर फिर से ध्यान केंद्रित किया जा सके।

शिक्षा का वित्त पोषण

मसौदा नीति ने शिक्षा में 6% सरकारी व्यय की प्रतिबद्धता को दोहराया। उल्लेखनीय है कि पहली राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 1968 ने शिक्षा में जीडीपी के 6% व्यय का सुझाव दिया था जिसे 1986 में दूसरे एनईपी ने दोहराया था। 2017-18 में भारत में शिक्षा पर सरकारी व्यय जीडीपी का 2.7% था।

तालिका 3: शिक्षा में कुल सार्वजनिक निवेश

देश

2017 में निवेश (जीडीपी के % के रूप में)

भारत

2.7

यूएसए

5

यूके

5.5

ब्राजील

6

शिक्षा पर कुल सार्वजनिक व्यय 10% है। मसौदा नीति इस दर को अगले 10 वर्षों में दोगुना करके 20% करने का प्रयास करती है। अतिरिक्त 10% में से 5% विश्वविद्यालयों और कॉलेजों (उच्च शिक्षा) पर खर्च किया जाएगा, 2% अतिरिक्त स्कूली शिक्षा में शिक्षकों की लागत या संसाधनों पर और 1.4% बच्चों की शुरुआती देखभाल और शिक्षा पर खर्च किया जाएगा।
 

कमिटी ने परिचालनगत समस्याओं और धनराशि के वितरण में लीकेज पर गौर किया। उदाहरण के लिए यह गौर किया गया कि जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थानों में लगभग 45% रिक्तियां हैं जिनके कारण उनके आबंटनों का इस्तेमाल नहीं किया गया या प्रभावी तरीके से इस्तेमाल नहीं हुआ। कमिटी ने संस्थागत विकास योजनाओं के जरिए धनराशि के अधिकतम और यथासमय उपयोग का सुझाव दिया।

शिक्षा में तकनीक

कमिटी ने गौर किया कि तकनीक निम्नलिखित में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है: (क) कक्षाओं में सीखने, सिखाने और मूल्यांकन की प्रक्रिया में सुधार करना, (ख) शिक्षकों को तैयार करने और उनके निरंतर पेशेवर विकास में सहायता देना, (ग) सुदूर क्षेत्रों तथा वंचित समूहों में शिक्षा तक पहुंच बढ़ाना, और (घ) समूची शिक्षा प्रणाली की योजना, प्रशासन और प्रबंधन में सुधार करना। कमिटी सभी शिक्षण संस्थानों के बिजलीकरण का सुझाव देती है, चूंकि बिजली तकनीक आधारित कार्यक्रमों की पूर्व शर्त है। इसके अतिरिक्त उसने निम्नलिखित का सुझाव दिया:
 

सूचना एवं संचार तकनीक के जरिए राष्ट्रीय शिक्षा अभियान: अभियान में वर्चुअल प्रयोगशालाएं शामिल हैं जिनके जरिए विभिन्न विषयों की प्रयोगशालाओं का दूर बैठे भी फायदा उठाया जा सकता है। इस अभियान के अंतर्गत राष्ट्रीय शिक्षा तकनीकी मंच का गठन भी किया जाएगा। यह एक स्वायत्त निकाय होगा और तकनीक को शुरू, स्थापित और प्रयोग करने से संबंधित फैसले लेने में मदद करेगा। यह मंच तकनीक आधारित कार्यक्रमों के संबंध में केंद्र और राज्य सरकारों को प्रमाण आधारित परामर्श देगा।
 

शिक्षा संबंधी आंकड़ों पर राष्ट्रीय रेपोजिटरी: राष्ट्रीय रेपोजिटरी की स्थापना की जाएगी। इसका मुख्य कार्य संस्थानों, शिक्षकों और विद्यार्थियों से संबंधित रिकॉर्ड्स का डिजिटल प्रारूप में रखरखाव करना होगा। इसके अतिरिक्त एक सिंगल ऑनलाइन डिजिटल रेपोजिटरी बनाई जाएगी जहां कॉपीराइट मुक्त शैक्षणिक संसाधन विभिन्न भाषाओं में उपलब्ध होंगे।

व्यावसायिक शिक्षा

कमिटी ने कहा कि 19-24 आयु वर्ग के 5% से भी कम श्रम बल को भारत में व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त होती है। इसके विपरीत यूएसए में 52%, जर्मनी में 75% और दक्षिण कोरिया में 96% युवाओं को व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त होती है। कमिटी ने सुझाव दिया कि 10 वर्षों की अवधि में चरणबद्ध तरीके से सभी शिक्षण संस्थानों (स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालयों) में व्यावसायिक शिक्षण कार्यक्रमों को एकीकृत किया जाना चाहिए। उल्लेखनीय है कि यह दक्षता विकास और उद्यमिता पर राष्ट्रीय नीति (2015) का अपवर्ड संशोधन है जिसका लक्ष्य 25% शिक्षण संस्थानों में व्यावसायिक शिक्षा प्रस्तावित करना था। इस संबंध में मुख्य सुझाव निम्न हैं:
 

व्यावसायिक पाठ्यक्रम: नौवीं से 12 वीं कक्षा के बीच के सभी स्कूली विद्यार्थियों को कम से कम एक व्यवसाय में व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त होनी चाहिए। प्रस्तावित स्कूल परिसरों की करिकुलम डिलिवरी विशेषज्ञता से लैस होनी चाहिए और यह मौजूदा नेशनल स्किल्स क्वालिफिकेशंस फ्रेमवर्क के दक्षता के स्तर के अनुकूल होनी चाहिए।
 

प्रस्तावित उच्च शिक्षण संस्थानों को ऐसे व्यावसायिक पाठ्यक्रम भी शुरू करने चाहिए जोकि अंडरग्रैजुएट शिक्षण कार्यक्रमों में एकीकृत हैं। मसौदा नीति का लक्ष्य यह है कि 2025 तक उच्च शिक्षण संस्थानों में दाखिला लेने वाले अधिकतम 50% विद्यार्थियों को व्यावसायिक शिक्षा उपलब्ध कराई जाए। इस समय इन संस्थानों के 10% से भी कम विद्यार्थियों को यह सुविधा उपलब्ध है।   
 

व्यावयासिक शिक्षा के एकीकरण के लिए राष्ट्रीय कमिटी: एक राष्ट्रीय कमिटी का गठन किया जाएगा ताकि इन लक्ष्यों को हासिल करने से संबंधित जरूरी कदमों पर कार्य किया जा सके। शिक्षण संस्थानों में व्यावसायिक शिक्षा के एकीकरण के लिए एक फंड की स्थापना की जाएगी। इस धनराशि के संवितरण का क्या तरीका होगा, कमिटी इस पर कार्य करेगी।

प्रौढ़ शिक्षा

जनगणना 2011 के अनुसार भारत में अब भी युवा निरक्षरों (15-24 वर्ष) की संख्या 3.26 करोड़ और वयस्क निरक्षरों (15 वर्ष और उससे अधिक) की संख्या 26.5 करोड़ है। इस संबंध में मसौदा नीति निम्नलिखित सुझाव देती है:
 

एनसीईआरटी के अंतर्गत एक घटक इकाई के रूप में केंद्रीय प्रौढ़ शिक्षा संस्थान की स्थापना की जाए। यह एक स्वायत्त संस्थान होगा जोकि प्रौढ़ शिक्षा के लिए राष्ट्रीय करिकुलम फ्रेमवर्क विकसित करेगा। इस फ्रेमवर्क में पांच व्यापक क्षेत्र शामिल होंगे: मूलभूत साक्षरता और संख्या ज्ञान, महत्वपूर्ण जीवन कौशल, व्यावसायिक दक्षता विकास, बुनियादी शिक्षा और सतत शिक्षा।
 

प्रौढ़ शिक्षा केद्रों को प्रस्तावित स्कूल परिसरों में शामिल किया जाएगा। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओपन स्कूलिंग में युवाओं और प्रौढ़ों के लिए संबंधित पाठ्यक्रमों को उपलब्ध कराया जाएगा। हाल ही प्रारंभ किए गए नेशनल ऑडिट ट्यूटर्स प्रोग्राम के जरिए प्रौढ़ शिक्षा के प्रशिक्षकों और प्रबंधकों का कैडर तथा वन-टू-वन ट्यूटर्स की टीम बनाई जाएगी।

 

 

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