गोरखपुर में फिराक का नाम तो है पर निशां नहीं:जन्मदिन विशेष

फिराकगोरखपुरी

बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं
तुझे ऐ ज़िंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं

रह-रह कर सिगरेट के कश भरना, चुटकी बजाकर राख को झाडऩा, बीच-बीच में बड़ी-बड़ी चमकती आंखें फैलाकर अपने तर्क की मजबूती से सामने वाले को निरुत्तर कर देना। मुशायरों और अदबी आयोजनों में अनूठे अंदाज में शिरकत से कभी दार्शनिक दिखना तो कभी खालिस शायर। कहने की जरूरत नहीं कि हम उर्दू अदब की दुनिया के उस अजीम शख्सियत की बात कर रहे हैं, जिसका नाम फिराक गोरखपुरी था। फिराक का यह अनूठा अंदाज गोरखपुर की फिजाओं में आज भी मौजूद है। तभी तो उनकी चर्चा से उस दौर के लोगों की आंखें चमक जाती हैं, जिन्होंने उन्हें देखा और महसूस किया है। चर्चा छिड़ते ही वह खो जाते हैं उन संस्मरणों में, जो महज संस्मरण नहीं बल्कि दस्तावेज हैं फिराक की शख्सियत के।

Firaq

रघुपति सहाय उर्फ फिराक गोरखपुरी का नाम देश और दुनिया के तमाम साहित्यप्रेमियों के बीच बड़े अदब से लिया जाता है। उनके अपने शहर गोरखपुर में भी उनका बड़ा नाम है लेकिन विडम्बना है कि उनके निशां यहां नहीं बचे। उर्दू का ये अजीम शायर जहां रहा, जहां पढ़ा, जहां की गलियों में घूमकर आजादी की अलख जगाई और कभी वोट भी मांगे उस शहर में उनके नाम पर न कोई स्मारक है न उनकी कहानी कहने वाली कोई और जगह।

बेतियाहाता में एक प्रतिमा जरूर है और चौराहे का नाम भी उनके नाम पर है। प्रतिमा के नीचे पत्थर पर उनकी रचनाओं की कुछ पंक्तियां खुदवाई गई हैं। इन पंक्तियों से पता चलता है कि फिराक गोरखपुरी जाति-पांति, धर्म और भाषाओं से ऊपर उठकर सारे हिन्दुस्तान की बात करते थे।

फिराक : एक परिचय

मूल नाम : रघुपति सहाय

पिता : गोरख प्रसाद ‘इबरत’

जन्म : 28 अगस्त 1896

निधन : 03 मार्च 1982

ग्राम : बनवारपार, गोला, गोरखपुर

कार्यक्षेत्र : इलाहाबाद

भाषा : हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू

1951 में लड़े थे गोरखपुर से चुनाव –

रवीन्द्र श्रीवास्तव उर्फ जुगानी भाई ने बताया कि बड़े समाजवादी नेता शिब्बन लाल सक्सेना के कहने पर फिराक गोरखपुरी आजादी के बाद पहले चुनाव में गोरखपुर से लड़ गए थे। एक सभा में उन्होंने खुद ही कांग्रेस उम्मीदवार सिंहासन सिंह की तारीफ कर दी। फिराक वह चुनाव हार गए। लेकिन अपनी बेबाकी और शायरी के जरिए जनता के दिलों पर तब भी राज करते रहे, आज भी छाये हुए हैं।

भारत चीन युद्ध के समय लिखी ये गजल 
सुखन की शम्मां जलाओ बहुत उदास है रात
नवाए मीर सुनाओ बहुत उदास है रात
कोई कहे ये खयालों और ख्वाबों से
दिलों से दूर न जाओ बहुत उदास है रात
पड़े हो धुंधली फिजाओं में मुंह लपेटे हुए
सितारों सामने आओ बहुत उदास है रात

फ़िराक गोरखपुरी को मिले सम्‍मान 
फ़िराक साहब को 1961 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला और 1967 में पद्म भूषण से भी नवाजा गया था। इसके आलावा 1970 में फ़िराक साहब को दो बड़े एजाजात और इनामात से भी नवाजा गया था, मगर उन्होंने फ़िराकपरस्ती और फ़िराक फहमी को ही अपने लिए सबसे बड़ा इनामी एजाज समझा।

दुनिया ने माना शायरी का लोहा
रवींद्र नाथ टैगोर के बाद फ़िराक ही ऐसे हिन्दुस्तानी शायर थे, जिन्हें दुनिया ने दिल से लगाया। फ़िराक को यह मुकाम यूं ही नहीं मिला। उन्होंने अपनी कहानी को कुछ यूं ही बयां किया है कि ‘मैंने इस आवाज को मर मर के पाला है फ़िराक। आज जिसकी निर्मली हे शम्मे मेहराब हयात।’

1951 में लड़े थे गोरखपुर से चुनाव 
रवीन्द्र श्रीवास्तव उर्फ जुगानी भाई ने बताया कि बड़े समाजवादी नेता शिब्बन लाल सक्सेना के कहने पर फिराक गोरखपुरी आजादी के बाद पहले चुनाव में गोरखपुर से लड़ गए थे। एक सभा में उन्होंने खुद ही कांग्रेस उम्मीदवार सिंहासन सिंह की तारीफ कर दी। फिराक वह चुनाव हार गए। लेकिन अपनी बेबाकी और शायरी के जरिए जनता के दिलों पर तब भी राज करते रहे, आज भी छाये हुए हैं।

राज्‍यसभा में भेजना चाहती थीं इंदिरा गांधी, ठुकराई पेशकश 
पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी फिराक को राज्यसभा में भेजने की बात कही। फ़िराक ने कुछ देर सोचा। शुक्रिया कहते हुए कहा कि आप मेरी इसी तरह ख्याल करती रहें, यही मेरे लिए सबसे बड़ी सौगात होगी।

मशहूर शेर

मौत का भी इलाज हो शायद
ज़िंदगी का कोई इलाज नहीं

कोई समझे तो एक बात कहूँ। इश्क़ तौफ़ीक़ है गुनाह नहीं

हम से क्या हो सका मोहब्बत में। ख़ैर तुम ने तो बेवफ़ाई की

ग़रज़ कि काट दिए ज़िंदगी के दिन ऐ दोस्त। वो तेरी याद में हों या तुझे भुलाने में

न कोई वादा न कोई यक़ीं न कोई उमीद मगर हमें तो तिरा इंतिज़ार करना था

उनकी कुछ पंक्तियां-
एक दुनिया है मेरी नज़रों में
पर वो दुनिया अभी नहीं मिलती।
रात मिलती है तेरी जुल्फ़ों में
पर वो आरास्तगी नहीं मिलती।
यूं तो हर इक का हुस्न काफ़िर है
पर तेरी काफ़िरी नहीं मिलती।
बासफ़ा दोस्ती को क्या रोयें
बासफ़ा दुश्मनी नहीं मिलती।
आंख ही आंख है मगर मुझसे
नरगिसे-सामरी नहीं मिलती।
जब तक ऊंची न हो जमीर की लौ
आंख को रौशनी नहीं मिलती।
सोज़े-ग़म से न हो जो मालामाल
दिल को सच्ची खुशी नहीं मिलती।

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