High Court:जीने के अधिकार से जुड़ा है पेंशन,जरा भी कटौती बर्दाश्त नहीं

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High Court Bombay

.पेशन मौलिक अधिकार का हिस्सा
.भारत के संविधान के अनुच्छेद 300-ए के तहत रिटायर्ड कर्मचारियों की देय पेंशन ‘संपत्ति’है

.भारत के संविधान के अनुच्छेद-21के तहत आजीविका के लिए गठित एक मौलिक अधिकार

पेंशन मौलिक अधिकारों का एक हिस्सा : BOMBAY HIGHCOURT

मुंबई हाई कोर्ट के(Bombay High Court) नागपुर बैंच ने एक मामले पर टिप्पणी करते हुए गुरुवार को कहा कि पेंशन मौलिक अधिकारों का एक हिस्सा है और किसी को भी इससे वंचित करना अस्वीकार्य है।

ये बातें न्यायमूर्ति रवि देशपांडे और न्यायमूर्ति एनबी सूर्यवंशी की पीठ ने नागपुर निवासी नैनी गोपाल की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहीं।

याचिकाकर्ता ने भारतीय स्टेट बैंक के केंद्रीकृत पेंशन प्रसंस्करण केंद्र की कार्रवाई पर शिकायत की उनका कहना था कि उनकी पेंशन की मासिक रकम 11,400 रुपये में से हर महीने 782 रुपये की कटौती की जा रही थी और कुल 3 लाख 69 हज़ार रुपये की कटौती हो चुकी है। उन्होंने इसकी वसूली के लिए याचिका दायर की थी। इस पर बैंक ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि किसी तकनीकी खराबी के कारण 2007 से उनकी पेंशन से 782 रुपये की कटौती की जा रही थी।

 

नागपुर के रहने वाले 85 साल के ये व्यक्ति 1994 में ऑर्डेनेंस फैक्ट्री से सहायक फोरमैन के रूप में रिटायर हुए थे।
एसबीआई ने कहा ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि याचिकाकर्ता की पेंशन निर्धारित थी इसलिए उन्हें ऑफिसर रैंक से नीचे का कर्मचारी माना गया न कि सिविल पेंशनर।

एसबीआई ने ये भी कहा कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने उसे गलती से दी गई “अतिरिक्त” पेंशन राशि वापस लेने के लिए अधिकृत किया था। हालांकि हाई कोर्ट(High Court) ने उनकी ये दलील ये कहकर खारिज कर दी कि वो अपने तकनीकी गलती के बारे में विस्तार से बताने में नाकाम रहे।

पेंशन मौलिक अधिकार का हिस्सा: BOMBAY HIGH COURT

न्यायाधीशों ने कहा कि ऑर्डनेंस फैक्ट्री ने 85 साल के व्यक्ति की पेंशन को ठीक करने में कोई त्रुटि नहीं की ऐसे में उनकी पेंशन की राशि काटे जाने का कोई अच्छा कारण दिखाई नहीं देता। पीठ ने बैंक की कार्रवाई को देखते हुए कहा कि यह रिटायर्ड कर्मचारियों के लिए देय पेंशन को ठीक नहीं कर सकता है।


पीठ ने कहा, “भारत के संविधान के अनुच्छेद 300-ए के तहत रिटायर्ड कर्मचारियों की देय पेंशन ‘संपत्ति’ है और यह भारत के संविधान के अनुच्छेद-21के तहत आजीविका के लिए गठित एक मौलिक अधिकार है। किसी भी व्यक्ति को पेंशन से वंचित रखना स्वीकार्य नहीं है।

” पीठ ने कहा, “इसलिए, हम मानते हैं कि याचिकाकर्ता की पेंशन को कम करने के लिए बैंक की कार्रवाई अनधिकृत और अवैध है” पीठ ने बैंक को निर्देशित किया कि वो उनकी पेंशन की कटौती बंद करें और अब तक की गई सारी कटौती की गई रकम वापस उनके खाते में डाल दें।

वरिष्ठ नागिरक की तरफ बैंक के असंवेदलशील व्यवहार को देखते हुए हाईकोर्ट (High Court) ने बैंक को याचिकार्ता के खाते में 50 हज़ार रुपये और डालने को कहा और अगर इसमें एक दिन की भी देरी होती है तो प्रतिदिन एक हज़ार रुपये का जुर्माना भरने के भी निर्देश दिए

इस संबंध में, पीठ ने कहा कि एक बैंक याचिकाकर्ता की तरह अपने खाताधारकों का ट्रस्टी है और अपने स्वयं के रोजगार के अलावा अन्य किसी कर्मचारी को देय पेंशन की राशि का विवाद करने के लिए कानून की नजर में कोई अधिकार नहीं है।

High Court ने कहा कि याचिकाकर्ता की आयु 85 वर्ष है और उन पर अपने 45 साल के विकलांग बेटे की देखभाल करने की जिम्मेदारी भी है, जिसे मंहगे इलाज की जरूरत होती है। अदालत ने कहा, वरिष्ठ नागरिकों की समस्याओं के प्रति संवेदनशीलता दिखाने के बजाय, बैंक ने घमंड दिखाया है और याचिकाकर्ता को Pension से हटा दिया है और उन्हें देय पेंशन से राशि की कटौती का कारण जानने के लिए कह दिया गया।

High Court:जीने के अधिकार से जुड़ा है पेंशन,जरा भी कटौती बर्दाश्त नहीं
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