क्यों परिषदीय विद्यालयों के अध्यापक अपने बच्चों को उन विद्यालयों में नही पढाते, जहाँ वे खुद पढाते हैं

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परिषदीय विद्यालय

आजकल यह चर्चा जोरो से चल रही है कि क्यों परिषदीय विद्यालयों के अध्यापक अपने बच्चों को उन विद्यालयों में नही पढाते जहाँ वे खुद पढाते हैं |

जिला बेसिक अधिकारी मुज़फ्फरनगर ने एक वार्ता में एक समाचार पत्र से कहा कि उन्होंने शासन को इस आशय का प्रस्ताव शासन को भेजा चुके हैं। |

बहुत विचित्र सा लगा सुनकर, अगर किसी अन्य विभाग के अधिकारी ने या फिर आम आदमी ने ये बात कही होती तो शायद बात समझ में आ भी जाती लेकिन जब जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी ऐसी बात कहें तो यही माना जाएगा कि अपने अधीनस्थों की समस्यायों और उनकी पीड़ाओं से परिचित नही हैं | ना ही वे परिषदीय विद्यालयों की वास्तविक स्थिति से |

संयुक्त मोर्चा संघ के अध्यक्ष अभिषेक त्रिपाठी ने कहा कि

परिषदीय विद्यालय के अध्यापक अपने बच्चों को अनिवार्य रूप से परिषदीय विद्यालयों में पढाएं, यह प्रस्ताव  तो वे शासन को भेज चुके हैं तो साथ ही उनसे निवेदन है कि कुछ अन्य प्रस्ताव भी अवश्य भेजें जैसे

१.    पहला प्रस्ताव

भारत  निर्वाचन आयोग और राज्य निर्वाचन आयोग को भेजा जाए कि अब परिषदीय विद्यालय का अध्यापक साल भर ‘बूथ लेविल अधिकारी’ का झोला उठाकर गली-गली घर-घर नही फिरेगा |

कभी वृहद पुनरीक्षण, कभी संक्षिप्त पुनरीक्षण तो कभी ‘डोर-टू-डोर सत्यापन’ के नाम पर परिषदीय अध्यापक को शिक्षण कार्य से दूर ना करें | भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और भारत निर्वाचन आयोग दुनिया का सबसे बड़ा निर्वाचन आयोग | लेकिन इस आयोग के पास अपने कर्मचारी नही हैं | इनका सारा काम निरन्तर परिषदीय अध्यापक ही करते हैं |

परिषदीय

२.    दूसरा प्रस्ताव

शासन को इस आशय का भेजें कि नगर निकाय किसी भी दशा में खण्ड शिक्षा अधिकारी कार्यालय से परिषदीय अध्यापकों की माँग ना करे | अपने सारे कार्य अपने स्टाफ से कराये |

३.    तीसरा प्रस्ताव

यह होना चाहिए कि गणना चाहे अगड़ों की हो या पिछडों की, मनुष्यों की हो या पशुओं की, परिषदीय अध्यापक यह कार्य नही करेंगें, ग्राम पंचायत सचिव पहले से ही इस कार्य के लिए उपलब्ध हैं |


४.    चौथा प्रस्ताव

यह हो कि परिषदीय अध्यापक विद्यालयों में निर्माण कार्य के लिए ईंट, रेट और बजरी का भाव ना पूछता फिरे, निर्माण कार्य खण्ड विकास कार्यालय का जे०ई० स्वयं कराये |


५.    पाँचवा प्रस्ताव

यह कि मध्याह्न भोजन से परिषदीय अध्यापक पूर्णतया मुक्त किये जाएँ | अध्यापक बच्चों से मतलब रखे ना कि धनिया, मिर्च मसाले और रसोई गैस से |

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६.    छठा प्रस्ताव

यह कि सभी विद्यालयों में आवश्यकता अनुसार सभी अध्यापकों के पद भरें जाएँ तथा बार-बार माँगी जाने वाली ढेर सारी सूचनाओं के लिए अलग से एक लिपिक की नियुक्ति की जाए |


७.    सातवाँ और सबसे महत्वपूर्ण प्रस्ताव

यह होना चाहिए कि परिषदीय अध्यापक के पास केवल और केवल बेसिक शिक्षा विभाग के आदेश पहुंचे किसी भी दशा में किसी अन्य विभाग के नही |


८.    आठवाँ प्रस्ताव

ये हो कि माध्यमिक शिक्षा परिषद के अध्यापकों से कभी भी बेसिक विद्यालयों में कोई कार्य नही कराया जाता चाहे वहाँ अध्यापकों की कितनी भी कमी क्यों न हो तो फिर बेसिक विद्यालयों के शिक्षक भी एक भी दिन इन विद्यालयों में अपनी सेवायें ना दें |

कंपोजिट स्कूल ग्रांट की धनराशि से विद्यालयों में क्रय की जाने वाली सामग्री विद्यालय में कराए जाने वाले कार्यों की सुझाव सूची/विवरण

इस प्रकार जब ये परिषदीय विद्यालय केवल विद्यालय ही बनकर चलेंगे तो बहुत उन्नति करेंगें | अभी तो ये विद्यालय तहसील कार्यालय, निर्वाचन कार्यालय, खण्ड विकास कार्यालय, स्थानीय निकाय कार्यालय के दिए गए कार्यों को करते-करते अपना स्वरुप ही भुला बैठे हैं |

मुझे हमेशा इस बात का ताज्जुब रहता है कि अपने छोटे से छोटे काम के लिए कोई भी विभाग परिषदीय अध्यापकों को अपने काम पर लगा लेता है और वो भी बिना बेसिक शिक्षा विभाग की इच्छा या अनुमति के , क्या कभी ऐसा भी हुआ है कि किसी अन्य विभाग ने कहा हो कि लो हमारा  एक  कर्मचारी आप उस विद्यालय में लगा लो जो वर्षों से अध्यापक विहीन है ?

 

 


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4 thoughts on “क्यों परिषदीय विद्यालयों के अध्यापक अपने बच्चों को उन विद्यालयों में नही पढाते, जहाँ वे खुद पढाते हैं”

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