सारा दोष अध्यापक का ??

विद्यालय का प्रथम और अनिवार्य उद्देश्य शिक्षा का संचरण है न कि नियमों की प्रयोगशाला…


क़रीब डेढ़ वर्ष अध्यापक हो जाने को हुआ मेरा, माफ करिए सरकारी अध्यापक क्योंकि सरकारी शब्द इतना भारी भरकम बना दिया गया है कि ध्यानाकर्षित और प्रयोग हेतु विकल्प बनाने के लिए हमेशा उपलब्ध रहता है।

मुझे कोई मलाल नहीं इस बात का किंतु इससे पहले जितना ज़िम्मेदार मैं था शायद उतना आज भी हूँ पर तब उसमें सत्यता अनिवार्य रूप से होती थी आज मजबूरन है…

ऐसा मेरे साथ नहीं लगभग उन तमाम अध्यापकों के साथ हर रोज़ होता है जो अपने अन्तःकरण की हर ध्वनि को भाषा का रूप देकर मासूम बच्चों को लिए शिक्षा देने की कोशिश में तत्पर रहते हैं।

व्यवस्था’ क्रिया-संचालन की एक तकनीक है न कि सिर्फ़ दस्तावेज़ का बंडल जो प्रायः हर विभाग में भरे पड़े हैं।

शिक्षा विभाग का एक छोटा सा सदस्य होने के नाते जान पाया हूँ यहाँ की बहुत सी खूबियों और खामियों को।

एक वर्ष से ज्यादा का समय मैंने विद्यालय में अकेले ही पूर्ण किया और आज भी हूँ इसमें किसी भी तरह की विसंगति की जिम्मेदारी पूर्णतया विभागीय है फिर वो चाहें बच्चों को वर्णमाला की पहचान का ना होना हो या विद्यालय का किसी दिन बन्द होना!

मैं स्वयं को दोषी नहीं मानता।दोषी मानता हूँ तो इस विभाग की व्यवस्था हेतु किए गए मेरे औपचारिक कलापों के लिए।

इसलिए छात्र- शिक्षक का उचित अनुपात सबसे आवश्यक है किसी भी प्रयोग को सफल बनाने और विद्यालय का ज्ञान-मंदिर बने रहने के लिए।
अब बात उनकी जो ज़्यादा तो नहीं किंतु हैं जरूर मैंने भी देखा इतने समय में,अध्यापक शब्द के उच्चारण के लायक़ भी नहीं पर अपने भाग्य और बच्चों के दुर्भाग्य से हो गए हैं,

उनके लिए सिर्फ़ आय का एक साधन मात्र है ‘अध्यापक’ हो जाना और इन्हीं की वज़ह से इस शब्द की गरिमा पे धूल जम गई है।

विभाग कागजों में अध्यापक से वृक्षारोपण रोपण करवाता है,उत्तीर्ण के रिपोर्टकार्ड बनवाता है,

जो उपलब्ध नहीं हैं उनका नामांकन भी करवाता है, वो ये भी जानता है कि दी गयी जानकारी कभी अपूर्ण नहीं होगी और पूरी तरह सही भी नहीं होगी फिर भी इसी तरह चलनी है आखिर व्यवस्था है।

जिसे बिना सम्पर्क के न तो समझा जा सकता है और न समझाया,इसलिए विभाग और अध्यापक दोनों को ज़िम्मेदारी की स्वतंत्र सत्यता पर ज़ोर देना चाहिए न कि उनके ढोने पर।


हर बच्चे का पढ़ना उसका मूल धर्म है पर क्षमता के आधार पर उन्हें पढ़ाना अध्यापक का कर्म।
ये मेरी हताशा नहीं महज़ चिंतन है जो बहुतों का होगा।

एक अकेला मास्टर
स्कूल जाए कि निष्ठा ट्रेनिंग करे या फिर शारदा योजना के गाँव गाँव घूम के सर्वे करें

या फाइनल परीक्षा की तैयारी बच्चों को करवाये। या फिर सारे विभागीय कार्य करें। या फिर mdm के लिए कोटेदारों और सब्ज़ी मंडी के चक्कर काटे।

ये मीटिंग वो जानकारी प्रापत्र बस इसी में निपट जा रही है सत्र के अंत के क़रीब बेसिक शिक्षा।

शिक्षक को शिक्षा देने दे सिर्फ ।

इस समय मूल कर्तव्यों से विरक्त रह कर सारे कार्य करने को मजबूर किया जा रहा हैं।
आख़िर दोषी तो सिर्फ शिक्षक ही रहेगा।

बेसिक का कलयुग रूपी सतयुग

thanks

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